पाकिस्तान की मेजबानी में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बेहद अहम शांति वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई है. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रविवार को साफ किया कि अथक प्रयासों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच मतभेदों को कम नहीं किया जा सका. हालांकि, वेंस ने मेजबान देश के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के प्रयासों की जमकर तारीफ की. 1979 के बाद पहली बार हुई इस सीधी वार्ता का विफल होना वैश्विक स्थिरता के लिए चिंता का विषय है. इसी बीच पहले यह जान लेते हैं कि आखिर सिर्फ 9 देश ही परमाणु संपन्न क्यों बने, बाकी देश ऐसा क्यों नहीं कर पाए.

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परमाणु शक्ति संपन्न देशों का खास क्लब

दुनिया में इस समय केवल 9 ऐसे देश हैं जिनके पास आधिकारिक तौर पर परमाणु हथियार मौजूद हैं. इन देशों में अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजराइल शामिल हैं. दिलचस्प बात यह है कि पूरी दुनिया में कुल 12,121 परमाणु हथियार हैं, लेकिन इनमें से 90% हिस्सा अकेले रूस और अमेरिका के पास हैं. रूस 5580 हथियारों के साथ पहले नंबर पर है, जबकि अमेरिका 5044 हथियारों के साथ दूसरे स्थान पर काबिज है.

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सिर्फ 9 देश ही क्यों हैं परमाणु संपन्न?

जर्मनी, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित और शक्तिशाली देशों के पास परमाणु बम न होने का सबसे बड़ा कारण एनपीटी (Nuclear Non-Proliferation Treaty) है. 1968 में अपनाई गई और 1970 में लागू हुई इस संधि का मुख्य उद्देश्य दुनिया को परमाणु युद्ध के खतरे से बचाना था. अब तक 190 देशों ने इस पर दस्तखत किए हैं. यह संधि नए देशों को परमाणु हथियार बनाने से रोकती है और केवल उन पांच देशों को इसकी अनुमति देती है जिन्होंने 1967 से पहले परीक्षण कर लिए थे.

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पांच बड़े देशों का एकाधिकार और नियम

एनपीटी संधि के तहत केवल अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, चीन और फ्रांस को ही परमाणु हथियार रखने का कानूनी अधिकार प्राप्त है. इन्हें परमाणु हथियार संपन्न राज्य माना जाता है, क्योंकि इन्होंने संधि लागू होने से पहले ही अपनी परमाणु क्षमता सिद्ध कर दी थी. बाकी 185 से अधिक देश जिन्होंने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं, वे तकनीकी रूप से सक्षम होने के बावजूद परमाणु हथियार नहीं बना सकते क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाएगा.

निहत्थे देशों की सुरक्षा का जिम्मा और भरोसा

मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर किसी परमाणु शक्ति संपन्न देश ने किसी निहत्थे देश पर हमला कर दिया तो क्या होगा? एनपीटी संधि के तहत यह प्रावधान है कि जो देश परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी परमाणु संपन्न मित्र देश उठाएंगे. इसे न्यूक्लियर अंब्रेला कहा जाता है. उदाहरण के तौर पर, अमेरिका दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों को सुरक्षा की गारंटी देता है, जैसा कि उसने 1950 के दशक के युद्ध के दौरान सैन्य हस्तक्षेप करके दिखाया था.

भारत और पाकिस्तान ने कैसे बना लिए बम?

जब संधि केवल पांच देशों को इजाजत देती है, तो भारत और पाकिस्तान ने परमाणु बम कैसे बना लिए? इसका सीधा जवाब यह है कि भारत और पाकिस्तान ने एनपीटी (NPT) संधि पर कभी हस्ताक्षर ही नहीं किए. इन देशों का तर्क था कि यह संधि भेदभावपूर्ण है. भारत ने अपनी सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए परीक्षण किए, जिसके बाद पाकिस्तान ने भी अपनी परमाणु क्षमता का प्रदर्शन किया. चूंकि ये देश संधि का हिस्सा नहीं थे, इसलिए तकनीकी रूप से उन पर संधि की पाबंदियां लागू नहीं हुईं.

उत्तर कोरिया और इजराइल की अलग कहानी

उत्तर कोरिया और इजराइल का मामला थोड़ा पेचीदा है. उत्तर कोरिया पहले एनपीटी संधि का हिस्सा था, लेकिन बाद में उसने परमाणु परीक्षण किए और संधि से बाहर निकल गया. आज वह एक घोषित परमाणु शक्ति है. दूसरी ओर, इजराइल ने कभी भी खुलकर अपने परमाणु कार्यक्रम की घोषणा नहीं की है, लेकिन माना जाता है कि उसने गुपचुप तरीके से परमाणु हथियार विकसित कर लिए हैं. ये दोनों देश अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपनी परमाणु नीति पर कायम हैं.

परमाणु बम बनाने में और क्या हैं चुनौतियां?

परमाणु बम न बना पाने का कारण सिर्फ संधि ही नहीं, बल्कि भारी खर्च और वैज्ञानिक चुनौतियां भी हैं. इसके अलावा, अगर कोई नया देश परमाणु परीक्षण करने की कोशिश करता है, तो उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो सकती है. ईरान का उदाहरण हमारे सामने है, जो लंबे समय से परमाणु कार्यक्रम को लेकर वैश्विक प्रतिबंधों और दबाव का सामना कर रहा है. यही वजह है कि अधिकांश देश परमाणु हथियारों के बजाय आर्थिक विकास पर ध्यान देना बेहतर समझते हैं.

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