Sanatan Dharma: सनातन धर्म को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है. तमिलनाडु विधानसभा में उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म को खत्म करने के आह्वान ने इस प्राचीन परंपरा और इसके विरोधियों के इतिहास को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. एक तरफ जहां सनातन को सृष्टि के आदि और अंत से जोड़कर देखा जाता है, वहीं दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक हस्तियां इसे सामाजिक बुराइयों की जड़ मानकर मिटाने की बात कर रही हैं. यह बहस केवल वर्तमान बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार हजारों साल पुराने इतिहास और पौराणिक मान्यताओं से जुड़े हैं. आइए समझते हैं कि आखिर यह धर्म कितना पुराना है और कौन इसे क्यों निशाना बनाता रहा है.
सनातन का अर्थ और इसकी प्राचीनता
'सनातन' शब्द का शाब्दिक अर्थ ही 'शाश्वत' है, यानी वह जो सदा से है और सदा बना रहने वाला है. इसे दुनिया का सबसे पुराना धर्म माना जाता है, जिसका न कोई आदि है और न ही कोई अंत. सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में मिलने वाले अवशेषों से इसके चिह्न स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं. आधुनिक शोध और वैज्ञानिक आधार पर इसे कम से कम 12,000 वर्ष पुराना माना गया है, लेकिन पौराणिक मान्यताओं और हिंदू ग्रंथों के अनुसार, यह धर्म 90,000 वर्षों से भी अधिक प्राचीन है. यह केवल एक पंथ नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है जिसमें ब्रह्मांड के समस्त ग्रह और नक्षत्र समाहित हैं.
चार युगों का कालक्रम और आधार
वैदिक शास्त्रों के अनुसार, काल चक्र को चार युगों में बांटा गया है- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग. सतयुग की अवधि 17 लाख 28 हजार वर्ष मानी गई है, जबकि त्रेतायुग जिसमें भगवान राम हुए, वह 12 लाख 96 हजार वर्ष का था. द्वापरयुग, जो भगवान कृष्ण का समय था, वह 8 लाख 64 हजार वर्ष का बताया गया है. वर्तमान में हम कलियुग में हैं, जिसकी कुल अवधि 4 लाख 32 हजार वर्ष बताई गई है. इन युगों के आधार के रूप में चार धाम- बद्रीनाथ, रामेश्वरम, द्वारिकाधीश और जगन्नाथ पुरी स्थापित हैं, जो सनातन की जड़ों को मजबूती प्रदान करते हैं.
उदयनिधि स्टालिन के विवादित बयान
सनातन धर्म को मिटाने की बहस सितंबर 2023 में तब शुरू हुई जब उदयनिधि स्टालिन ने चेन्नई में एक सम्मेलन के दौरान इसकी तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों से की. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इसे केवल विरोध की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे जड़ से खत्म कर देना चाहिए. हाल ही में, मई 2026 में तमिलनाडु विधानसभा में अपने पहले भाषण के दौरान उन्होंने फिर से इन बातों को दोहराया. उनका तर्क है कि सनातन धर्म लोगों को जाति के आधार पर बांटता है, इसलिए इसे सामाजिक समानता के लिए समाप्त करना अनिवार्य है.
विरोध करने वाली और कितनी हस्तियां?
उदयनिधि अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्होंने इस तरह की बयानबाजी की है. डीएमके सांसद ए. राजा ने इस विवाद को और बढ़ाते हुए सनातन धर्म की तुलना एचआईवी (HIV) और कुष्ठ रोग जैसे सामाजिक कलंकों से कर दी. उन्होंने इसे देश और दुनिया के लिए खतरा बताया.
वहीं, डीएमके मंत्री के. पनमुरी का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि विपक्ष का 'इंडिया अलायंस' मुख्य रूप से सनातन धर्म को खत्म करने के लिए ही गठित किया गया है. इन बयानों ने देशभर में धार्मिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज कर दिया है.
पेरियार और आत्मसम्मान आंदोलन का इतिहास
सनातन धर्म के कड़े विरोध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 'पेरियार' ई.वी. रामासामी के विचारों में मिलती है. उदयनिधि और डीएमके नेता अक्सर पेरियार का हवाला देते हैं. पेरियार ने 1925 में 'आत्मसम्मान आंदोलन' की शुरुआत की थी, जिसमें उन्होंने जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के विरोध के नाम पर सनातन धर्म पर तीखे प्रहार किए थे. उन्होंने धर्म और ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देते हुए इसे दलितों और पिछड़ों के शोषण का हथियार बताया था. यही विचारधारा आज भी दक्षिण भारत की कुछ राजनीतिक पार्टियों का आधार बनी हुई है.
सनातन के भौगोलिक और आध्यात्मिक आधार
सनातन धर्म केवल किताबी बातों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के भूगोल में भी इसके आधार बिखरे हुए हैं. वाल्मीकि रामायण में 64 हजार तीर्थों का उल्लेख है. सप्तऋषि और अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन तथा द्वारका जैसी सप्तपुरियां सनातन के प्रमुख स्तंभ हैं. इतने प्राचीन और व्यापक आधार वाले धर्म को लेकर जब भी कोई नकारात्मक टिप्पणी होती है, तो वह केवल आस्था पर चोट नहीं होती, बल्कि भारत की हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक निरंतरता को भी चुनौती देती है.
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