Tamil Nadu Politics: तमिलनाडु की राजनीतिक एक बार फिर से राष्ट्रीय सुर्खियों में आ चुकी है.  विधानसभा चुनावों के बाद हॉर्स ट्रेडिंग के आरोप सामने आए हैं. भारत के सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में कथित तौर पर यह मांग की गई है कि सरकार बनाने की प्रक्रिया के दौरान विधायकों की खरीद फरोख्त की सीबीआई जांच कराई जाए. इस याचिका में यह भी मांग की गई है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाए. इस बढ़ते राजनीतिक विवाद के बीच आइए जानते हैं कि राजनीति में हॉर्स ट्रेडिंग का मतलब क्या होता है?

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राजनीति में हॉर्स ट्रेडिंग का क्या मतलब? 

आज राजनीति में हॉर्स ट्रेडिंग शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर विधायकों या फिर सांसदों जैसे जनप्रतिनिधियों के बीच राजनीतिक समर्थन की कथित खरीद फरोख्त या फिर सौदेबाजी को बताने के लिए किया जाता है. यह मुहावरा आमतौर पर उन स्थितियों को दर्शाता है जब राजनीतिक दल विपक्षी या फिर निर्दलीय विधायकों को पाला बदलने के लिए मनाकर बहुमत हासिल करने की कोशिश करते हैं. इन कोशिशें को अक्सर समर्थन के बदले पैसे, मंत्री पद, राजनीतिक लाभ या फिर दूसरे प्रकार के निजी फायदे देने के आरोपों से जोड़ा जाता है. यह शब्द आमतौर पर पर्दे के पीछे होने वाले राजनीतिक सौदे, गुप्त बातचीत, दलबदल और सत्ता हासिल करने के लिए बनाए गए विवादास्पद गठबंधनों से जुड़ा होता है ना कि वैचारिक सिद्धांतों का पालन करने से.

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कहां से आया यह शब्द? 

यह शब्द असल में राजनीति से आया ही नहीं. इसकी जड़ 19वीं सदी की शुरुआत में संयुक्त राज्य अमेरिका में मिलती है. लगभग 1820 के दशक में इस शब्द का इस्तेमाल शाब्दिक अर्थ में घोड़े के बाजारों में होने वाली सौदेबाजी का वर्णन करने के लिए किया जाता था. वहां व्यापारी अक्सर काफी चालाक सौदागरों के रूप में जाने जाते थे. 

उस समय घोड़ों के व्यापारिक कीमतों पर काफी सावधानी से मोलभाव करते थे और बेहतर सौदे पक्के करने के लिए जानवरों के दोष या फिर उनकी खराब हालत को छिपा लेते थे. इसी वजह से हॉर्स ट्रेडिंग धीरे-धीरे चालक सौदेबाजी की युक्तियों और कड़े मोलभाव से जुड़ गया.

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कैसे बना यह मुहावरा लोकप्रिय?

इस मुहावरे को मशहूर अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन की रचनाओं के जरिए से और ज्यादा लोकप्रिय किया गया.‌ 1893 में उन्होंने अपनी लघुकथा द ऑटोबायोग्राफी ऑफ आइजैक एलन में इस शब्द का इस्तेमाल किया. अपनी कहानी के जरिए से उन्होंने ऐसे चालक ग्रामीण व्यापारियों के बारे में बताया जो अपनी तीखी बातचीत और सौदेबाजी करने में सक्षम थे. वक्त के साथ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने इस मुहावरे का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. उन्होंने इसका इस्तेमाल बंद दरवाजे के पीछे होने वाली राजनीतिक बातचीत को बताने के लिए शुरू कर दिया. 

यह शब्द राजनीति में कैसे आया? 

19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत तक कई लोकतंत्रों में राजनीतिक व्यवस्थाएं तेजी से पार्टियों पर आधारित होती जा रही थीं. पत्रकारों ने देखा कि कई राजनीतिक बातचीत पारंपरिक घोड़े के बाजार में होने वाले मोल-भाव की तरह होती थी. 1950 के दशक तक यह मुहावरा राजनीति शब्दावली में अपनी जगह मजबूत कर चुका था और चुनाव, गठबंधन बनाने या फिर विश्वास मत के दौरान सांसदों को प्रभावित करने की विवादित कोशिशों को बताने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाने लगा.

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