पुरानी दिल्ली की तंग गलियां, सदियों पुरानी इमारतें और इतिहास की परतों में छिपी कहानियां अक्सर चर्चा में रहती हैं. इन्हीं के बीच तुर्कमान गेट के पास स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है.  इसकी वजह आधी रात को चला एमसीडी का बुलडोजर एक्शन है. अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए की गई इस कार्रवाई के दौरान हालात इतने बिगड़ गए कि पत्थरबाजी हुई, पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और पूरा इलाका छावनी में बदल गया. 

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इस घटनाक्रम ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा खड़ा किया, बल्कि लोगों के मन में यह सवाल भी पैदा कर दिया कि आखिर यह मस्जिद कितनी पुरानी है, इसे किसने बनवाया था और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है. तो आइए जानते हैं फैज-ए-इलाही मस्जिद का पूरा इतिहास और मौजूदा विवाद की वजह क्या है. 

क्या है पूरा मामला?

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दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में एमसीडी ने आधी रात को अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए बड़ा अभियान चलाया. फैज-ए-इलाही मस्जिद और उससे सटी जमीन पर बने अवैध निर्माण को हटाने के लिए करीब 32 बुलडोजर लगाए गए. जैसे ही कार्रवाई शुरू हुई, कुछ स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया. देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया.

पुलिस और एमसीडी की टीम पर पत्थरबाजी शुरू हो गई. हालात को काबू में करने के लिए पुलिस को आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा. इस दौरान पांच लोगों को हिरासत में लिया गया और पूरे इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई. एमसीडी का दावा है कि करीब 85 प्रतिशत अवैध अतिक्रमण हटा दिया गया है, जबकि स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्रवाई बिना पर्याप्त सूचना के की गई. 

किसने बनवाई थी दिल्ली की फैज-ए-इलाही मस्जिद?

फैज-ए-इलाही मस्जिद कोई नई इमारत नहीं है. इतिहासकारों के अनुसार यह मस्जिद लगभग 250 साल पुरानी है और इसका निर्माण 18वीं शताब्दी में हुआ था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मस्जिद का निर्माण महान सूफी संत हजरत शाह फैज-ए-इलाही ने करवाया था.

कहा जाता है कि उन्होंने इसे सिर्फ नमाज अदा करने की जगह के तौर पर नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और प्रेम का केंद्र बनाने के उद्देश्य से बनवाया था. यह मस्जिद उस दौर में बनी जब मुगल शासन अपने अंतिम चरण में था.

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसका निर्माण मुगल बादशाह अहमद शाह बहादुर या शाह आलम द्वितीय के समय हुआ. फैज-ए-इलाही मस्जिद को सिर्फ एक धार्मिक स्थल कहना गलत होगा. यह जगह सदियों से गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल रही है.

यहां सूफी परंपरा की झलक मिलती है, जहां धर्म से ऊपर इंसानियत, शांति और भाईचारे को महत्व दिया गया. कहा जाता है कि पुराने समय में यहां अलग-अलग समुदायों के लोग आते थे और सूफी संतों की शिक्षाओं से प्रेरणा लेते थे. 

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