Tibet History: तिब्बत कभी एक खुद से चलने वाली राजनीतिक इकाई थी. इसकी अपनी सरकार, सेना, मुद्रा और पासपोर्ट व्यवस्था थी. हालांकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद चीन ने तिब्बत पर कंट्रोल कर लिया और 1950 से 1951 के बीच वहां अपना अधिकार जमाने के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल किया. इसके बाद हुई घटनाओं ने तिब्बत की राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह से बदल दिया. 

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तिब्बत की आजादी का इतिहास 

7वीं और 9वीं सदी के बीच तिब्बत एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभरा. इसका हिमालय और मध्य एशियाई क्षेत्र के बड़े हिस्सों पर कंट्रोल था. बाद की सदियों में तिब्बत पर मंगोल और चीन के मिंग और किंग राजवंशों का अलग-अलग स्तर पर प्रभाव रहा. हालांकि वक्त के साथ इस रिश्ते का स्वरूप और दायरा बदलता रहा जबकि तिब्बत के पास काफी हद तक आंतरिक स्वायत्तता बनी रही. 

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1911 में चीन के किंग राजवंश के पतन के बाद एक बड़ा मोड़ आया. 13वें दलाई लामा तिब्बत लौटे और 1912-1913 में इसकी आजादी की घोषणा की. लगभग अगले 4 दशकों तक तिब्बत ने अपनी सरकार चलाई और एक आजाद देश से जुड़ी संस्थाओं को बनाए रखा. 

माओ जेडोंग और तिब्बत पर चीन का दावा

चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद स्थिति बदल गई. 1949 में माओ जेडोंग और कम्युनिस्ट पार्टी ने मुख्य भूमि चीन पर कंट्रोल कर लिया, तो नई सरकार ने तिब्बत को चीनी क्षेत्र का हिस्सा घोषित कर दिया. बीजिंग ने अपनी नियोजित कार्रवाई को साम्राज्यवादी प्रभाव से तिब्बत की मुक्ति बताया. तिब्बत के लिए यह नया स्थापित पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ एक बड़े टकराव की शुरुआत थी.

1950 में चीन का सैन्य आक्रमण 

अक्टूबर 1950 में पीएलए हजारों सैनिकों के साथ तिब्बत में दाखिल हुई. तिब्बत की सेना अपेक्षाकृत छोटी और कमजोर हथियारों वाली थी और वह चीनी सेना की ताकत का मुकाबला करने में असमर्थ थी. सैन्य दबाव की वजह से आखिरकार तिब्बत को बीजिंग के साथ बातचीत के लिए मजबूर होना पड़ा. मई 1951 में तिब्बती प्रतिनिधियों ने बीजिंग में 17 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते ने औपचारिक रूप से तिब्बत को चीनी संप्रभुता के अधीन कर दिया. 

इसी के साथ इसमें तिब्बत के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के कुछ पहलुओं को बनाए रखने का वादा भी शामिल था. बाद में तिब्बती अधिकारियों ने इस बात का तर्क दिया कि यह समझौता दबाव में स्वीकार किया गया था और इस वजह से यह सच्ची सहमति नहीं थी. 

1959 का विद्रोह 

धीरे-धीरे चीन का कंट्रोल बढ़ता गया और साथ ही कम्युनिस्ट राजनीतिक और आर्थिक नीति लागू करने की कोशिश भी हुई. इन घटनाओं से तिब्बत में विरोध की भावना बढ़ने लगी. मार्च 1959 में ल्हासा में एक बड़ा विद्रोह हुआ. चीनी सेना ने विद्रोह को दबा दिया और 14वें दलाई लामा तिब्बत से भागकर भारत पहुंच गए. इसके बाद निर्वासित तिब्बती प्रशासन ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अपना मुख्यालय बनाया. यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिब्बत के मुद्दे को उठाता रहा है, हालांकि चीन इसके राजनीतिक दावों को खारिज करता है.

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चीन के लिए तिब्बत इतना जरूरी क्यों? 

तिब्बत का महत्व सिर्फ उसके राजनीतिक इतिहास तक ही सीमित नहीं है. इसकी भौगोलिक स्थिति इसे काफी ज्यादा रणनीतिक महत्व देती है. अक्सर दुनिया की छत कहे जाने वाले तिब्बती पठार की स्थिति भारत और दूसरे एशियाई देशों के साथ चीन की सीमा के पास काफी जरूरी है. 

चीन के कंट्रोल से पहले तिब्बत ब्रिटिश भारत और चीन के बीच एक भौगोलिक बफर के रूप में भी काम करता था. पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में इसके शामिल होने से चीनी सैन्य और प्रशासनिक शक्ति सीधे भारत के साथ हिमालयी सीमा तक पहुंच गई.

तिब्बत को उसके जल संसाधनों की वजह से भी काफी जरूरी माना जाता है. कई बड़ी एशियाई नदी प्रणालियां तिब्बती पठार या फिर उसके आसपास से निकलती हैं. इनमें ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज और मेकांग शामिल हैं. इसी वजह से तिब्बत को एशिया का जल टावर भी कहा जाता है.

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