Countries Without Trees: यह सुनकर शायद हैरानी हो सकती है लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे इलाके हैं जहां पर प्राकृतिक पेड़ काफी कम हैं या फिर खराब मौसम की वजह से है ही नहीं. कतर, ओमान के कुछ हिस्से, ग्रीनलैंड और ऐतिहासिक रूप से आइसलैंड जैसे देशों को काफी ज्यादा रेगिस्तान या जमी हुई पर्माफ्रॉस्ट की वजह से पेड़ों के कम विकास की समस्या का सामना करना पड़ा है. आइए जानते हैं उन देशों के बारे में जहां पर पेड़ है ही नहीं.

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कुछ देशों में पेड़ क्यों नहीं है 

कतर और कुवैत जैसे रेगिस्तानी देशों में बारिश काफी कम होती है और मिट्टी रेतीली होती है. इस वजह से पेड़ों के लिए जड़ जमाना और जिंदा रहना काफी मुश्किल हो जाता है. इसके उलट ग्रीनलैंड जैसी जगहों पर उल्टी समस्या है. यहां पर काफी ज्यादा ठंड और जमी हुई पर्माफ्रॉस्ट की परतें पौधों की जड़ों को जमीन में घुसने से रोकती हैं.  यह प्राकृतिक सीमाएं बताती हैं कि ऐसे इलाकों में बड़े जंगल क्यों नहीं बन पाए. 

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दुनिया में ऑक्सीजन का सबसे बड़ा उत्पादक 

आपको बता दें कि जमीन के पेड़ ही ऑक्सीजन का एकमात्र मुख्य स्रोत नहीं है. वैज्ञानिकों का ऐसा कहना है कि दुनिया की 50% से 80% ऑक्सीजन समुद्री जीव जैसे फाइटोप्लांकटन, शैवाल और समुद्री घास द्वारा पैदा होती है. क्योंकि कई बिना पेड़ों वाले देश तटीय इलाकों के पास हैं. इस वजह से उन्हें आसपास के महासागरों से ऑक्सीजन से भरपूर हवा मिलती है. 

हवा लगातार वैश्विक पवन प्रणालियों के जरिए से ग्रह के चारों तरफ घूमती रहती है. अमेजन वर्षावन या फिर दक्षिण पूर्व एशिया जैसे घने जंगलों वाले इलाकों में पैदा होने वाली ऑक्सीजन महाद्वीप और महासागरों में फैलती है. यह प्राकृतिक परिसंचरण इस बात को पक्का करता है कि कम हरियाली वाले देशों को भी स्वस्थ जीवन जीने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन मिले. 

ग्रीन हाउस और नियंत्रित कृषि 

ग्रीनलैंड जैसे काफी ठंडे इलाकों में पौधों और पेड़ों की खेती नियंत्रित ग्रीनहाउस के अंदर की जाती है. यहां तापमान नमी और मिट्टी की स्थितियों को काफी सावधानी से नियंत्रित किया जाता है. ये सुविधाएं हरियाली देने के साथ-साथ स्थानीय खाद्य उत्पादन में भी मदद करती हैं. एडवांस्ड विलवणीकरण, ड्रिप सिंचाई और जलवायु नियंत्रित रोपण तकनीक के अब खराब वातावरण वाले देशों को धीरे-धीरे अपने हरित क्षेत्र का विस्तार करने में मदद कर रही है. यह पहल स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करती है और साथ ही प्राकृतिक बारिश पर निर्भरता को कम करती है.

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