Governor Removal Rule: बिहार में नई सरकार के गठन से पहले लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन को राज्य का नया गवर्नर अप्वॉइंट किया गया है. वह आरिफ मोहम्मद खान की जगह लेंगे. आरिफ मोहम्मद खान ने 2 जनवरी 2025 को यह पद संभाला था. जब भी कोई नया गवर्नर अप्वॉइंट किया जाता है तो अक्सर ही यह सवाल उठता है कि गवर्नर को पद से हटाया कैसे जाता है? आइए जानते हैं एक गवर्नर के कार्यकाल के बारे में सभी संवैधानिक नियम.

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गवर्नर को हटाने के लिए संवैधानिक प्रोविजन 

भारतीय संविधान के तहत गवर्नर को हटाने की प्रक्रिया कई दूसरे संवैधानिक पदों की तुलना में काफी आसान है. राष्ट्रपति या फिर ऊपरी अदालतों के जजों के उलट गवर्नर को पद से हटाने के लिए इंपीचमेंट कि कार्रवाई की जरूरत नहीं होती. गवर्नर की नियुक्ति और हटाने के नियम भारत के संविधान के आर्टिकल 156 में बताए गए हैं. इस प्रोविजन के मुताबिक गवर्नर राष्ट्रपति की मर्जी तक पद पर रहता है. 

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यानी भारत के राष्ट्रपति के पास किसी भी समय गवर्नर को पद से हटाने का पूरा अधिकार है. संविधान में इस कार्रवाई के लिए पार्लियामेंट्री वोट या फिर इंपीचमेंट जैसी किसी भी फॉर्मल प्रक्रिया की जरूरत नहीं है. 

क्या होता है हटाने का आधार? 

गवर्नर को हटाने की प्रक्रिया की एक खास बात यह है कि संविधान में हटाने का कोई भी खास आधार नहीं है. दूसरे संवैधानिक पदों के उलट जहां पर गलत काम,  नाकाबिलियत या फिर कानून का उल्लंघन साबित होना जरूरी है, एक गवर्नर को टेक्निकल बिना किसी बताए कारण की भी हटाया जा सकता है. इससे केंद्र सरकार को यह तय करने में काफी फ्लैक्सिबिलिटी मिलती है कि गवर्नर को पद पर बने रहना चाहिए या फिर नहीं. 

क्या होती है केंद्र सरकार की भूमिका? 

हालांकि संविधान राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है लेकिन असल में यह फैसला यूनियन काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स लेती है. भारत के पार्लियामेंट्री सिस्टम में राष्ट्रपति आमतौर पर केंद्र सरकार की सलाह पर काम करते हैं. इस वजह से गवर्नर को नियुक्त करने या फिर हटाने का असली फैसला आमतौर पर केंद्र सरकार करती है और राष्ट्रपति इसे औपचारिक रूप से मंजूरी देते हैं. 

अपनी मर्जी से इस्तीफा देने का ऑप्शन 

एक गवर्नर अपनी मर्जी से भी पद को छोड़ सकता है. ऐसी स्थिति में गवर्नर भारत के राष्ट्रपति को इस्तीफा देता है. इस्तीफा स्वीकार होने के बाद गवर्नर का कार्यकाल खत्म हो जाता है और केंद्र सरकार उस पद पर किसी नए व्यक्ति को नियुक्त करती है.

इंपीचमेंट प्रोसीजर की जरूरत नहीं 

एक और जरूरी बात यह है कि गवर्नर को हटाने के लिए इंपीचमेंट की जरूरत नहीं होती. भारत के प्रेसिडेंट के उलट जिन्हें सिर्फ पार्लियामेंट में एक मुश्किल इंपीचमेंट प्रोसेस के जरिए हटाया जा सकता है, गवर्नर को हटाना पूरी तरह से सेंट्रल लेवल पर लिया गया एक एग्जीक्यूटिव फैसला है.

सुप्रीम कोर्ट का क्लैरिफिकेशन 

भले ही संविधान गवर्नर को हटाने का बड़ा अधिकार देता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2010 के बीपी सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस के फैसले में एक जरूरी लिमिट लगाई थी. कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था कि गवर्नर प्रेसिडेंट की मर्जी से काम करते हैं लेकिन हटाने की पावर का इस्तेमाल मनमाने ढंग से, मनमाने तरीके से या फिर पॉलिटिकल वजह से नहीं किया जा सकता. खास तौर पर कोर्ट ने यह कहा था कि किसी गवर्नर को सिर्फ इसलिए नहीं हटाया जाना चाहिए क्योंकि केंद्र में नई सरकार सत्ता में आ गई है.

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