Female Genital Mutilation Khatna: इन मुस्लिम देशों में बैन है महिलाओं का खतना, फिर भारत में क्यों नहीं लगी रोक?
Female Genital Mutilation Khatna: महिला खतना (FGM) पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने भारत में इस प्रथा के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं. कई मुस्लिम देशों ने इसे अपराध घोषित कर बैन कर दिया है.

- कानूनी पेच फंसा, आस्था बनाम अधिकार का मुद्दा.
Female Genital Mutilation Khatna: सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने फीमेल जेनिटल म्यूटेशन (FGM) यानी महिला खतना की कुप्रथा पर एक नई बहस छेड़ दी है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है. यदि कोई परंपरा बच्चियों के स्वास्थ्य और उनके मौलिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ करती है, तो उसे धर्म की आड़ में जारी नहीं रखा जा सकता है. दुनिया के कई बड़े मुस्लिम देशों ने इस दर्दनाक प्रथा को अपने यहां पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है, लेकिन भारत में यह आज भी कानूनी पेचीदगियों के बीच फंसी हुई है.
किन मुस्लिम देशों ने अपनाई सख्ती?
दुनिया के कई प्रभावशाली मुस्लिम बहुल देशों ने वैज्ञानिक तथ्यों और मानवाधिकारों को प्राथमिकता देते हुए इस प्रथा पर कड़ा प्रहार किया है. मिस्र ने साल 2008 में ही खतना पर प्रतिबंध लगा दिया था और 2016 में इसे एक गंभीर अपराध की श्रेणी में डाल दिया था. इसी तरह सूडान जैसे रूढ़िवादी देश ने भी साल 2020 में कानून बदलकर इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया. इंडोनेशिया, जो दुनिया का सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है, उसने भी साल 2024 में इस पर सख्त पाबंदी लागू कर दी है.
अफ्रीकी देशों का कड़ा रुख
अफ्रीका के वे देश जहां यह प्रथा कभी बहुत गहरी थी, अब वहां की सरकारें इसके खिलाफ खड़ी हो गई हैं. जिबूती ने 1994 में ही इस पर रोक लगा दी थी, जबकि सेनेगल ने 1999 और गाम्बिया ने 2015 में विशेष आपराधिक कानून के तहत इसे प्रतिबंधित किया. मॉरिटानिया और युगांडा जैसे देशों में भी अब इसे कानूनी रूप से दंडनीय अपराध माना जाता है. इन देशों की पहल साबित करती है कि यह प्रथा इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक कुरीति है.
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भारत में क्यों फंसा है पेंच?
भारत में यह मुद्दा मुख्य रूप से दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ा है. यहां इस प्रथा को रोकने में सबसे बड़ी बाधा धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 25-26) का तर्क है. समुदाय का एक प्रभावशाली वर्ग इसे खफ्ज कहता है और इसे अपनी अनिवार्य धार्मिक प्रथा मानता है. उनका तर्क है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित है और इसमें कोई शारीरिक नुकसान नहीं होता है. हालांकि, मानवाधिकार कार्यकर्ता और इसी समुदाय की कई महिलाएं इसे शारीरिक शोषण और मानवाधिकारों का हनन मानती हैं.
कानूनी पेचीदगी और खफ्ज का तर्क
भारत में इस प्रथा को लेकर सबसे बड़ा विवाद इसकी परिभाषा पर है. जहां दुनिया इसे 'म्यूटेशन' यानी अंग-भंग मानती है, वहीं समुदाय के समर्थकों का दावा है कि यह एक मामूली प्रक्रिया है. सरकार ने भी पूर्व में कहा था कि इस प्रथा के व्यापक स्तर पर होने के कोई पुख्ता सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. इसी अस्पष्टता और समुदाय के आंतरिक विरोध के कारण अब तक कोई स्पष्ट कानून नहीं बन सका है.
कुरीति या आस्था
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन करार दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देश इसे हतोत्साहित कर रहे हैं, तो भारत में इसे जारी रखने का कोई ठोस आधार नहीं बचता है. यह लड़ाई अब आस्था बनाम अधिकार की बन चुकी है, जिसका अंतिम समाधान अब न्यायिक फैसले पर ही टिका है.
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