लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव खारिज होने के अगले दिन वे सदन में वापस आ चुके हैं. इस दौरान उन्होंने माइक बंद करने के आरोपों का भी खुलकर जवाब दिया है. लेकिन क्या वाकई स्पीकर की कुर्सी के पास कोई ऐसा बटन होता है, जिसे दबाते ही किसी सांसद की आवाज खामोश हो जाती है? या फिर इस पूरी व्यवस्था के पीछे कोई तकनीकी और प्रशासनिक मशीनरी काम करती है? आइए, संसद के माइक कंट्रोल के पीछे की पूरी हकीकत और इसके कड़े नियमों को विस्तार से समझते हैं.

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संसद का माइक सिस्टम 

स्पीकर ओम बिरला ने सदन में निष्पक्षता के सवालों का जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि सदन किसी व्यक्ति की जागीर नहीं है और यहां नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं. माइक बंद करने के विवाद पर उन्होंने साफ कहा कि स्पीकर की मेज पर ऐसा कोई बटन नहीं लगा होता जिससे वे माइक को नियंत्रित कर सकें. यह बयान उस समय आया है जब विपक्षी नेता लगातार यह दावा कर रहे थे कि उन्हें बोलते समय बीच में ही रोक दिया जाता है या उनका माइक जानबूझकर ऑफ कर दिया जाता है.

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कहां से कंट्रोल होती है आवाज?

संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में एक विशेष चैंबर होता है, जहां प्रशिक्षित साउंड टेक्नीशियन बैठते हैं. यह चैंबर सदन की कार्यवाही के ठीक सामने या ऊंचाई पर स्थित होता है, जहां से अधिकारी कांच की दीवार के जरिए पूरे सदन को देख सकते हैं. यह कर्मचारी लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय के स्थायी अधिकारी होते हैं, किसी राजनीतिक दल के नहीं. उनके पास एक बड़ा इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल बोर्ड होता है, जिसमें हर सांसद की सीट संख्या के अनुसार बटन लगे होते हैं.

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सीट नंबर और माइक्रोफोन का सीधा कनेक्शन

संसद के भीतर हर माननीय सांसद की सीट तय होती है और हर सीट पर एक माइक्रोफोन डेस्क लगी होती है. इन माइक्रोफोन का एक विशिष्ट नंबर होता है, जो सीधे कंट्रोल चैंबर के बोर्ड से जुड़ा होता है. जब कोई सांसद अपनी सीट से खड़ा होता है और उसे बोलने की अनुमति मिलती है, तभी चैंबर में बैठा अधिकारी उस विशेष सीट का माइक ऑन करता है. यदि कोई सांसद अपनी सीट से हटकर दूसरी जगह से बोलने की कोशिश करता है, तो उसका माइक तकनीकी रूप से काम नहीं करता है.

क्या हैं माइक ऑन और ऑफ करने के निर्धारित नियम?

संसद की कार्यवाही के लिए एक नियम पुस्तिका होती है. नियम के अनुसार, माइक तभी चालू किया जाता है जब संबंधित सांसद का नाम पुकारा जाए या स्पीकर उसे बोलने का निर्देश दें. इसके विपरीत, यदि कोई सांसद बिना अनुमति के बीच में बोलने लगता है, तो उसे नियमों का उल्लंघन माना जाता है और टेक्नीशियन को माइक बंद रखने का निर्देश होता है. इसके अलावा, शून्य काल के दौरान एक सांसद को बोलने के लिए अक्सर तीन मिनट का समय मिलता है. जैसे ही समय की सीमा समाप्त होती है, सिस्टम अपने आप या मैन्युअल रूप से माइक को डिस्कनेक्ट कर देता है.

स्पीकर के निर्देश 

भले ही स्पीकर के पास खुद माइक बटन न हो, लेकिन साउंड टेक्नीशियन स्पीकर के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं. यदि सदन में अत्यधिक हंगामा हो रहा हो या कोई सांसद असंसदीय भाषा का इस्तेमाल कर रहा हो, तो अध्यक्ष निर्देश दे सकते हैं कि उनकी बातों को रिकॉर्ड पर न लिया जाए. ऐसी स्थिति में टेक्नीशियन तुरंत माइक बंद कर देते हैं. सभापति या अध्यक्ष के विवेक पर ही तय होता है कि किसी सदस्य को आवंटित समय से ज्यादा बोलने देना है या नहीं.

क्या ऑटोमैटिक तरीके से बंद होता है माइक?

माइक बंद होने की प्रक्रिया कई बार ऑटोमैटिक और कई बार मैन्युअल होती है. उदाहरण के तौर पर, कुछ विशेष बहसों में सांसदों को पढ़ने के लिए 250 शब्दों की सीमा या निश्चित समय दिया जाता है. जैसे ही डिजिटल टाइमर शून्य पर पहुंचता है, सिस्टम उस सीट की आवाज को काट देता है. यह किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं, बल्कि सदन के समय का कुशल प्रबंधन करने की एक तकनीकी व्यवस्था है ताकि सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का मौका मिल सके.

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