अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि समुद्र का पानी इतना खारा और नमकीन होता है कि उसे सीधा पीया नहीं जा सकता, तो फिर उसी से होने वाली बारिश की बूंदें मीठी और कम नमक वाली कैसे हो जाती हैं? जबकि वैज्ञानिक तौर पर बारिश का पानी और समुद्र का जल एक ही विशाल तंत्र यानी जल चक्र का हिस्सा हैं. दोनों के स्वाद में दिखने वाले इस बड़े अंतर की वजह बेहद सामान्य और पूरी तरह से भौतिक विज्ञान के नियमों पर आधारित है. 

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इस प्रक्रिया की शुरुआत होती है सौर ऊर्जा यानी सूरज की किरणों से. सूरज की तेज गर्मी पृथ्वी पर मौजूद समुद्रों, नदियों, झीलों और तालाबों के सतह पर मौजूद पानी को गर्म करती है. जब यह पानी एक निश्चित तापमान पर गर्म होता है, तो वह द्रव रूप से बदलकर वाष्प यानी भाप का रूप ले लेता है और हल्का होकर तेजी से ऊपर आसमान की ओर उठने लगता है.

समुद्र में नमक कैसे बनता है?

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भाप बनने की इस पूरी प्रक्रिया को प्रयोगशाला के एक बहुत ही साधारण प्रयोग से आसानी से समझा जा सकता है. यदि आप एक बर्तन या गिलास में पानी लें, उसमें भरपूर नमक मिला दें और फिर उसे आंच पर रखकर उबालें, तो पानी धीरे-धीरे भाप बनकर उड़ जाएगा, लेकिन बर्तन की तलहटी में केवल नमक के क्रिस्टल बचे रह जाएंगे. ठीक यही प्राकृतिक प्रक्रिया बड़े पैमाने पर हमारे समुद्रों में हर पल घटित होती रहती है.

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जब सूरज की किरणों से समुद्र का पानी वाष्पीकृत होकर वायुमंडल में ऊपर जाने लगता है, तो शुद्ध जल के अणु ही भाप में बदलते हैं. पानी में घुले हुए भारी नमक, सोडियम क्लोराइड और अन्य प्रकार के खनिज समुद्र के भीतर ही छूट जाते हैं. यही कारण है कि समुद्र से उठने वाली भाप पूरी तरह से नमक-मुक्त और शुद्ध होती है.

समुद्र से कैसे बनते हैं बादल?

ऊपर उठती हुई यह नम-रहित वाष्प जब वायुमंडल के ऊपरी हिस्सों में पहुंचती है, तो वहां का तापमान काफी कम और ठंडा होता है. ठंडक मिलते ही पानी की यह भाप संघनन की प्रक्रिया से गुजरती है. इस प्रक्रिया के तहत वाष्प के छोटे-छोटे कण वापस पानी की सूक्ष्म बूंदों में तब्दील होने लगते हैं.

जब अरबों-खरबों ऐसी सूक्ष्म बूंदें हवा में आपस में जुड़ती हैं, तो वे बादलों का आकार ले लेती हैं. समय के साथ जब बादलों के भीतर पानी की यह बूंदें आपस में मिलकर बड़ी और भारी होने लगती हैं, तो हवा उन्हें अपने साथ संभाल नहीं पाती है. इसके बाद वे गुरुत्वाकर्षण के कारण बारिश की बूंदों के रूप में वापस हमारी धरती पर गिरने लगती हैं. संक्षेप में कहें तो सूरज पानी को गर्म करके भाप बनाता है, भाप ऊपर जाकर बादल बनती है और फिर वही पानी वर्षा बनकर धरती पर लौट आता है.

बरसात का पानी मीठा क्यों?

इस पूरे चक्र को देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि जब समुद्र से केवल शुद्ध पानी भाप बनकर उड़ा था और नमक समुद्र के विशाल जलभंडार में ही छूट गया था, तो बादलों से बरसने वाली बूंदों में नमक होने का सवाल ही पैदा नहीं होता है. इसी वैज्ञानिक वजह से वर्षा जल में समुद्री जल जैसी खारेपन की मौजूदगी नहीं होती है.

हालांकि, यहां यह जानना भी जरूरी है कि बादलों से निकलने वाला पानी रासायनिक रूप से भले शुद्ध हो, लेकिन जमीन तक पहुंचते-पहुंचते वह हवा में मौजूद धूल, धुएं और विभिन्न गैसों के संपर्क में आ जाता है. इसलिए गिरता हुआ बारिश का पानी खारा भले न हो, लेकिन वह पूरी तरह से शुद्ध भी नहीं रहता है.

समुद्र में इतना खारापन क्यों?

जब बारिश का पानी मीठा होता है, तो फिर समुद्र में इतना खारापन जमा कैसे हो गया? इसका उत्तर भी बारिश की बूंदों की यात्रा में ही छिपा है. जब बारिश का पानी धरती की सतह पर गिरता है, तो वह चट्टानों, पत्थरों और मिट्टी से होकर बहता है. चट्टानों और मिट्टी में प्राकृतिक रूप से कई प्रकार के लवण और खनिज (जैसे सोडियम और क्लोराइड) जमा होते हैं.

बारिश का हल्का अम्लीय पानी जब इन पत्थरों से टकराता है, तो वह इन खनिजों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में अपने भीतर घोल लेता है. इसके बाद यह पानी छोटी-छोटी धाराओं और नदियों से होता हुआ अंततः विशाल समुद्र में जाकर मिल जाता है. लाखों-करोड़ों सालों से नदियां लगातार खनिजों को ढोकर समुद्र में डाल रही हैं. समुद्र से पानी तो भाप बनकर उड़ जाता है, लेकिन नमक वहीं जमा होता रहता है, जिससे समुद्र का पानी समय के साथ अत्यधिक खारा हो चुका है.

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