Sagar Poisonous Liquor Tragedy: मध्य प्रदेश के सागर जिले में कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से अब तक 13 लोगों  की मौत हो चुकी है और 100 से ज्यादा लोग बीमार हैं और उनका इलाज चल रहा है. ऐसा कहा जा रहा है कि मरीजों की हालत गंभीर है. सागर के बांदा पुलिस स्टेशन में 20 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. इस घटना ने एक बड़ा सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि अधिकारियों द्वारा शराब को सुरक्षित घोषित करने से पहले उसकी क्वालिटी और उसमें मौजूद जहरीले पदार्थ की जांच कैसे की जाती है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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सैंपल का रजिस्ट्रेशन और सीलिंग 

पहला स्टेप पुलिस या फिर आबकारी विभाग से मिले सैंपल की स्थिति की जांच करना है. अधिकारी इस बात को देखते हैं कि कंटेनर ठीक से सील है या फिर नहीं और क्या इस बात का कोई संकेत है कि सैंपल के साथ छेड़छाड़ की गई है. इसके बाद सैंपल को एक गुप्त कोड नंबर दिया जाता है. इससे निष्पक्षता को बनाए रखने में मदद मिलती है क्योंकि जांच करने वाले वैज्ञानिक को जरूरी नहीं की सैंपल से जुड़े ब्रांड, निर्माता या फिर फैक्ट्री के बारे में पता हो. 

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फिजिकल जांच 

शराब की सबसे पहले बुनियादी फिजिकल और ऑर्गेनोलेप्टिक जांच की जाती है. वैज्ञानिक रंग, गंध और दिखाई देने वाले बाहरी कणों जैसी विशेषताओं की जांच करते हैं. इसे शुरुआती जांच से सैंपल में साफ तौर पर दिखने वाली कमियों का पता चल सकता है. हालांकि इसके वास्तविक कंपोजिशन और सुरक्षा का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक केमिकल जांच की जरूरत होती है. 

गैस क्रोमेटोग्राफी जांच 

शराब की जांच के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सबसे जरूरी एनालिटिकल तकनीक में से एक गैस क्रोमेटोग्राफी है. यह तकनीक सैंपल में मौजूद अलग-अलग केमिकल घटकों को अलग करती है. इसके बाद वैज्ञानिक उनकी पहचान कर सकते हैं और उनकी मात्रा का पता लगा सकते हैं. इसका इस्तेमाल एथिल अल्कोहल की मात्रा का पता लगाने और इस बात को जांचने के लिए किया जा सकता है कि क्या कंपोजिशन प्रोडक्ट की बताई गई क्षमता के मुताबिक है.

उदाहरण के लिए अगर किसी बोतल पर अल्कोहल की खास मात्रा लिखी है तो लैबोरेट्री एनालिसिस में यह पता लगाया जा सकता है कि क्या असल अल्कोहल की मात्रा बताई गई वैल्यू से मेल खाती है. 

जहरीले पदार्थों की जांच 

लेबोरेटरी संभावित रूप से खतरनाक पदार्थों के लिए भी सैंपल की जांच करती हैं. मेथनॉल प्रकाश ध्यान दिया जाता है जो ठीक से ना बनाए गए या फिर मिलावटी अल्कोहल वाले प्रोडक्ट में मौजूद हो सकता है. मेथनॉल काफी जहरीला होता है और इससे गंभीर जहर फैल सकता है. इससे अंधापन और मौत भी हो सकती है. हालात और टेस्टिंग की जरूरत के आधार पर लैब भारी धातुओं, साइनाइड और दूसरे हानिकारक पदार्थों के लिए भी सैंपल की जांच कर सकती हैं. यह टॉक्सिकोलॉजिकल जांच खास तौर पर नकली शराब के मामलों में जरूरी होती है.

क्लीन चिट कैसे दी जाती है? 

जरूरी जांच पूरी होने के बाद सरकारी एनालिस्ट एक आधिकारिक लैब रिपोर्ट को तैयार करता है. प्रोडक्ट को तभी सुरक्षित माना जा सकता है जब वह लागू मानकों को पूरा करता हो. पहला, सैंपल में मेथेनॉल और दूसरे जहरीले पदार्थ तय सुरक्षा सीमा से ज्यादा नहीं होने चाहिए. दूसरा, इसकी असल अल्कोहल मात्रा बताई गई जानकारी से मेल खानी चाहिए और आखिर में लैब को लागू मानकों के मुताबिक प्रोडक्ट को इंसानों को पीने के लिए सही पाना चाहिए.

अगर सैंपल जरूरी शर्तों को पूरा करता है तो रिपोर्ट इसे इंसानों के पीने के लिए सही प्रमाणित कर सकती है. जब्त की गई या फिर शक के घेरे में आई शराब के मामले में ऐसे नतीजे को क्लीन चिट कहा जा सकता है क्योंकि लैब को उस सैंपल में कोई भी अयोग्य केमिकल या फिर सुरक्षा से जुड़ी समस्या नहीं मिली.

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लैब टेस्टिंग क्यों जरूरी है? 

लैब रिपोर्ट जांच के लिए भेजे गए खास सैंपल पर आधारित होती है. इस वजह से किसी भी जांच में सैंपल की सही सीलिंग, पहचान और हैंडलिंग जरूरी होती है. नकली शराब के शक वाले मामलों में वैज्ञानिक टेस्टिंग जांच करने वालों को यह पता लगाने में मदद कर सकती है कि प्रोडक्ट में जहरीले पदार्थ थे या फिर नहीं. या फिर क्या इसका अल्कोहल कंपोजिशन बताई जानकारी से मेल खाता था और क्या यह पीने के लिए सही था. 

इस तरह क्लीन चिट सिर्फ इस वजह से नहीं दी जाती की शराब सामान्य दिखती है या फिर उसमें उम्मीद के मुताबिक गंध है. यह इसके केमिकल कंपोजिशन और सुरक्षा विशेषताओं की वैज्ञानिक जांच के बाद दी जाती है और इसके बाद अधिकृत लैब से आधिकारिक रिपोर्ट आती है.

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