रूस से हर दिन कितना तेल मंगवाता है भारत, 16 मई के बाद कितनी हो जाएगी कमी?
16 मई 2026 को रूसी तेल आयात पर अमेरिकी छूट खत्म हो रही है, जिससे भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी. मई में रिकॉर्ड 23 लाख बैरल प्रतिदिन आयात के बाद अब इसमें भारी गिरावट देखने को मिल सकती है.

- रूस से तेल आयात पर अमेरिका की छूट 16 मई को समाप्त हो रही है.
- नई पाबंदियों से भारतीय रिफाइनरी को रूसी तेल में कटौती का सामना करना पड़ेगा.
- भारत पश्चिम अफ्रीका और अमेरिका से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा रहा है.
- ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से ऊर्जा बाजार में अस्थिरता है.
पश्चिम एशिया के युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी ने पहले ही वैश्विक ऊर्जा बाजार में आग लगा रखी है, लेकिन भारत के लिए असली परीक्षा की घड़ी अब आई है. अमेरिका द्वारा रूस से कच्चा तेल आयात करने के लिए दी गई विशेष छूट की समय सीमा शनिवार, 16 मई 2026 को समाप्त हो रही है. इस डेडलाइन के खत्म होने का सीधा मतलब है कि भारत की तेल रिफाइनरी कंपनियों को अब रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति में भारी कटौती का सामना करना पड़ सकता है. दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति न केवल आर्थिक बल्कि रणनीतिक तौर पर भी बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाली है.
अमेरिकी डेडलाइन और तेल का गणित
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा दी गई 48 घंटे की मोहलत अब अंतिम चरण में है. 16 मई के बाद रूस से तेल आयात करने की शर्तें बेहद कड़ी हो जाएंगी. भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है, ऐसे में रूस एक भरोसेमंद और सस्ता विकल्प बनकर उभरा था. यूक्रेन युद्ध के बाद रियायती दरों पर मिले तेल ने भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी सहारा दिया था, लेकिन अब अमेरिकी दबाव और टैरिफ नीतियों के कारण इस सस्ते तेल के प्रवाह पर ब्रेक लगने की आशंका बढ़ गई है.
16 मई के बाद रूसी तेल में कितनी होगी कमी?
मई 2026 के शुरुआती हफ्तों में भारत ने रूस से रोजाना करीब 23 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड स्तर है. इस उछाल की बड़ी वजह यह थी कि अमेरिका ने उन जहाजों को आने की अनुमति दी थी जो पहले से लोड हो चुके थे. हालांकि, यह राहत केवल 16 मई तक ही सीमित है. आंकड़ों का विश्लेषण करें तो जुलाई 2024 में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 44.6 प्रतिशत थी, जो जनवरी 2026 तक घटकर 20.6 प्रतिशत रह गई थी. अब नए जहाजों के न आने से मई का औसत आयात गिरकर 19 लाख बैरल प्रतिदिन रह जाने का अनुमान है.
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होर्मुज की नाकेबंदी और ईरान युद्ध का असर
ईरान युद्ध ने वैश्विक तेल बाजार की कमर तोड़ दी है. फारस की खाड़ी से होकर आने वाले तेल के टैंकर अब सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी जैसी स्थिति है. भारत जैसे बड़े खरीदारों के लिए यह मार्ग जीवनरेखा की तरह है. होर्मुज जलडमरूमध्य से सप्लाई ठप होने के कारण भारत को अब उन विकल्पों की तलाश करनी पड़ रही है जो भौगोलिक रूप से दूर हैं और महंगे भी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में आई उथल-पुथल ने भारत सरकार और रिफाइनरी कंपनियों की नींद उड़ा दी है.
नए विकल्पों की तलाश में भारत
16 मई की समयसीमा को देखते हुए भारत की दो दिग्गज सरकारी कंपनियों- इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) ने अपनी रणनीति बदल दी है. सूत्रों के मुताबिक, इसी सप्ताह इन कंपनियों ने पश्चिम अफ्रीका और अमेरिका से कच्चे तेल की बड़ी खेप खरीदी है. यह कदम रूसी तेल की संभावित कमी और खाड़ी देशों में जारी तनाव के बीच बैकअप तैयार करने के लिए उठाया गया है. भारत अब केवल एक या दो देशों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी सप्लाई चेन को विविध बनाने की कोशिश में जुटा है.
अजरबैजान और अफ्रीका से नए समझौतों की तैयारी
भारत पेट्रोलियम (BPCL) अब उन देशों के साथ अल्पकालिक तेल सप्लाई समझौतों पर विचार कर रही है, जिनसे पहले कभी बड़े पैमाने पर व्यापार नहीं हुआ. अजरबैजान और विभिन्न अफ्रीकी देशों से संपर्क साधा जा रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य फारस की खाड़ी पर अपनी निर्भरता को कम करना है, क्योंकि वहां युद्ध के कारण कभी भी सप्लाई चेन पूरी तरह टूट सकती है. 16 मई के बाद रूसी तेल पर लगने वाली पाबंदियां भारत को इन नए बाजारों में अधिक सक्रिय होने के लिए मजबूर कर रही हैं.
रूस पर प्रतिबंध और अमेरिका की कूटनीति
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने सख्त प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन बीच में ईरान युद्ध छिड़ने से वैश्विक तेल कीमतें आसमान छूने लगीं. कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका को मजबूरन भारत जैसे देशों को रूस से तेल खरीदने की छूट देनी पड़ी थी. अब जबकि अमेरिका फिर से प्रतिबंधों को कड़ा कर रहा है, भारत के लिए संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है. अमेरिका चाहता है कि रूस की कमाई कम हो, लेकिन वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता भी बनी रहे- यह एक ऐसा विरोधाभास है जिसका खामियाजा भारत जैसे उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है.
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