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क्या अमेरिका ने पैदा किए तालिबान और अलकायदा? जानें क्या था 'ऑपरेशन साइक्लोन'

भले ही तालिबान अमेरिका की आखों की किरकिरी बना हो, लेकिन एक समय अमेरिका ने ही इसे खड़ा किया था और इसी की आड़ में ओसामा बिन लादेन और अलकायदा भी पनपा था. यह सब अमेरिका के 'ऑपरेशन साइक्लोन' का नतीजा था.

दुनिया में राजनीतिक घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदल रहे हैं. अब तक जो तालिबान वैश्विक मान्यता के लिए दुनियाभर के देशों से गुहार लगा रहा था, उसे अमेरिका के कट्टर प्रतिद्वंदी रूस का साथ मिला है. रूस ने अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दे दी है. इस तरह तालिबान को मान्यता देने वाला वह दुनिया का पहला देश बन गया है. यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वही तालिबान है, जिसके खिलाफ अमेरिका दशकों तक अफगानिस्तान में जंग लड़ता रहा. 

2020 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान ने अशरफ गनी सरकार के खिलाफ अपनी मुहिम तेज कर दी थी और 15 अगस्त, 2021 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया. इसके बाद से ही यहां तालिबन का शासन है. अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी और तालिबान का सत्ता पर कब्जा अमेरिकी सरकार के लिए बड़ी हार थी, क्योंकि अमेरिका ने तालिबान और अलकायदा के खात्मे के लिए यहां पानी की तरह पैसा बहाया था. 

भले ही तालिबान इस समय अमेरिका की आखों की किरकिरी बना हो, लेकिन एक समय अमेरिका ने ही इसे खड़ा किया था और इसी की आड़ में ओसामा बिन लादेन और अलकायदा भी पनपा था. ऐसे में चलिए जानते हैं अफगानिस्तान में क्या था अमेरिका का 'ऑपरेशन साइक्लोन'? जिसने तालिबान और अलकायदा जैसे संगठनों के लिए फ्यूल की तरह काम किया था.    

शीत युद्ध में जंग का मैदान बना अफगानिस्तान

बात 1978 से शुरू होती है. अफगानिस्तान में सौर क्रांति के बाद कम्युनिस्ट सरकार सत्ता पर काबिज हुई थी. हालांकि, सरकार के गठन के तुरंत बाद इसे प्रतिरोधी इस्लामी आंदोलन का सामना करना पड़ा. इस आंदोलन को लीड करने वालों को मुजाहिदीन के नाम से जाना जाता था. मुजाहिदीन लड़ाके अफगानिस्तान की कम्युनिस्ट सरकर को उखाड़ फेंकना चाहते थे, लेकिन इस सरकार को सोवियत रूस का साथ मिला. अफगानिस्तान की कम्युनिस्ट सरकार को समर्थन देने के लिए सोवियत रूस ने अपने 30 हजार सैनिक अफगानिस्तान में भेजे. सोवियत रूस के सैनिकों ने इस्लामी आंदोलन को कुचलना शुरू कर दिया. इसी बीच सोवियत रूस के दबदबे को खत्म करने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) एक्टिव हुई और उसने मुजाहिदीन लड़ाकों को हथियार और पैसा देना शुरू कर दिया, लेकिन सोवियत रूस जैसी ताकत को रोकने के लिए सिर्फ हथियारों और पैसों से काम नहीं चलना था, जिसके बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन ने 1986 ने बड़ा फैसला लिया. उन्होंने मुजाहिदीन लड़ाकों को स्टिंगर मिसाइल मुहैया करानी शुरू कर दी. इन मिसाइलों ने अफगानिस्तान में सोवियत रूस को बड़ा नुकसान पहुंचाया और देखते ही देखते अफगानिस्तान अमेरिका और सोवियत रूस के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा में जंग का मैदान बन गया. अमेरिका ने अफगानिस्तान में चलाए गए इसी मिशन को 'ऑपरेशन साइक्लोन' नाम दिया. उस समय यह अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के इतिहास का सबसे महंगा, बड़ा और गुप्त ऑपरेशन था.  

सोवियत रूस की वापसी के बाद हुआ तालिबान का उदय

अफगानिस्तान में करीब नौ साल रहने के बाद धीरे-धीरे सोवियत रूस की पकड़ कमजोर पड़ने लगी थी. इसी बीच 1988 में सोवियत संघ के नेता मिखाइल गोर्बाचोव ने सेना को वापस बुला लिया. 1989 में सोवियत सैनिकों ने पूरी तरह अफगानिस्तान छोड़ दिया. बिना सोवियत रूस के समर्थन के अफगानिस्तान की कम्युनिस्ट सरकार ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाई और अफगानिस्तान की सत्ता पर इस्लामी लड़ाकों का कब्जा हो गया, जिसे बाद में तालिबान कहा गया. 

इस्लामी आंदोलन से ही हुआ अलकायदा का जन्म

एक तरफ जिस इस्लामी आंदोलन से तालिबान का जन्म हुआ तो दूसरी तरफ इस्लामी आंदोलन का हिस्सा रह चुके कुछ लड़ाकों ने अलकायदा नामक संगठन बनाया. इस संगठन का उद्देश्य इस्लामी संघर्ष को अफगानिस्तान से बाहर फैलाना था. तालिबान ने इस संगठन और इसके नेता ओसामा बिन लादेन का अपने ही देश में पनाह दी और यहीं से 11 सितंबर, 2002 को अमेरिका पर हमले की योजना बनाई गई. 

यह भी पढ़ें: तालिबान सरकार को रूस ने दी मान्यता, जानें कौन से देश आज भी इसे मानते हैं आतंकी संगठन

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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