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26 जनवरी तक दिल्ली में क्यों की जाती है परिंदों की पार्टी, इससे क्या होता है फायदा?

इसे बर्ड स्ट्राइक कहा जाता है, जो बहुत खतरनाक हो सकता है. इसी खतरे से बचने के लिए हर साल दिल्ली में एक अनोखी योजना बनाई जाती है, जिसे लोग मजाक में परिंदों की पार्टी भी कहते हैं.

हर साल 26 जनवरी को जब देश अपना गणतंत्र दिवस मनाता है, तब दिल्ली सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान में भी देश की ताकत का प्रदर्शन देखती है.लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और वायुसेना के जांबाज पायलट आसमान में हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं. यह नजारा देखने लायक होता है. लेकिन ऐसे में एक सवाल हर किसी के मन में आता है कि इन तेज रफ्तार विमानों के रास्ते में अगर कोई परिंदा आ जाए तो क्या होगा.

खासतौर पर चील (Black Kite) जैसे बड़े पक्षी अगर विमानों से टकरा जाएं, तो इसे बर्ड स्ट्राइक कहा जाता है, जो बहुत खतरनाक हो सकता है. इसी खतरे से बचने के लिए हर साल दिल्ली में एक अनोखी योजना बनाई जाती है, जिसे लोग मजाक में परिंदों की पार्टी भी कहते हैं. इस योजना के तहत चीलों को  खाना खिलाकर विमानों के रास्ते से दूर रखा जाता है. तो आइए जानते हैं कि  26 जनवरी तक दिल्ली में क्यों परिंदों की पार्टी की जाती है और इससे क्या फायदा होता है. 

26 जनवरी तक दिल्ली में क्यों परिंदों की पार्टी की जाती है?

दिल्ली के आसमान में बड़ी संख्या में चीलें पाई जाती हैं, खासकर पुरानी दिल्ली इलाके जैसे लाल किला, जामा मस्जिद और आसपास के क्षेत्र। ये पक्षी ऊंचाई पर उड़ते हैं और अगर वे गणतंत्र दिवस के फ्लाईपास्ट कॉरिडोर में आ जाएं, तो विमानों के लिए खतरा बन सकते हैं. इसलिए दिल्ली सरकार, वन विभाग और भारतीय वायुसेना (IAF) मिलकर एक खास रणनीति अपनाते हैं. यह रणनीति चीलों को उनके पसंदीदा  खाने से एक जगह रोकना है जब चीलों को नीचे जमीन के पास खाना मिल जाता है, तो वे ऊंचाई पर उड़ान नहीं भरतीं और विमान सुरक्षित रहते हैं.

इस साल योजना में एक बड़ा बदलाव किया गया है. जहां पहले चीलों को भैंस का मांस खिलाया जाता था. वहीं इस साल पहली बार बोनलेस चिकन दिया जा रहा है. अधिकारियों के अनुसार, चिकन हल्का होता है, जल्दी खाया जाता है और चीलों को ज्यादा पसंद भी आता है.इससे वे तय जगहों पर ही बनी रहती हैं. 

किन इलाकों में होती है यह पार्टी?

दिल्ली के ऐसे 20 संवेदनशील इलाके चुने गए हैं, जहां चीलों की संख्या सबसे ज्यादा रहती है, जैसे लाल किला, जामा मस्जिद, मंडी हाउस, दिल्ली गेट, मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट और आसपास के पुराने शहर के इलाके. इन जगहों पर चीलों को 20–30 ग्राम के छोटे चिकन टुकड़े फेंके जाते हैं ताकि वे नीचे ही रहें. 

कितने दिनों तक और कितना मांस?

यह पूरी एक्सरसाइज 15 जनवरी से 26 जनवरी तक चलती है. इसमें कुल इस्तेमाल होने वाला चिकन 1,275 किलो है. जिसे सात अलग-अलग दिनों में सप्लाई किया जाता है. ज्यादातर दिनों में 170 किलो प्रतिदिन और  22 जनवरी को 255 किलो, यह सारा मीट पहले वजीराबाद स्थित वाइल्डलाइफ रेस्क्यू सेंटर पहुंचाया जाता है, फिर वहां से अलग-अलग जगहों पर भेजा जाता है. हर जगह रोज करीब 20 किलो चिकन इस्तेमाल होता है. 

इस योजना से क्या फायदा होता है?

इस योजना से विमानों के लिए बर्ड स्ट्राइक का खतरा कम होता है, वायुसेना का फ्लाईपास्ट सुरक्षित रहता है, चीलों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है और वन्य जीव संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों में संतुलन बना रहता है. 

यह भी पढ़ें: वेनेजुएला की तरह ईरान पर अमेरिका ने कब्जा किया तो सबसे ज्यादा नुकसान किसे, भारत या चीन?

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