Mallikarjun Kharge Manusmriti Statement: परीक्षा संशोधन बिल 2026 पर बहस के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मनुस्मृति के बारे में एक बड़ी टिप्पणी की. इसके बाद राज्यसभा में राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया.‌ शैक्षणिक संस्थानों में कथित वैचारिक प्रभाव का जिक्र करते हुए खड़गे ने इस बात का दावा किया कि मनुस्मृति के अनुयायी शूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर रहे हैं और वेदों को सुनने या फिर पढ़ने वाले शूद्रों के लिए कथित तौर पर गंभीर दंड तय किए गए हैं. उनकी टिप्पणी पर सत्ता पक्ष ने कड़ा विरोध जताया. इसने सदन में तीखी नोकझोंक पैदा कर दी. आइए जानते हैं की खड़गे का दावा कितना सही था.

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क्या था खड़गे का दावा?

अपने भाषण के दौरान खड़गे ने इस बात का दावा किया कि मनुस्मृति में वेदों को सुनने वाले शूद्र के कान में पिघला हुआ शीशा या फिर रांगा भर देने, उन्हें पढ़ने वाले की जीभ काटने और धर्म ग्रंथ को याद करने वाले को टुकड़े-टुकड़े करने का प्रावधान है.  हालांकि इस तरह का दंड मनुस्मृति में नहीं पाया जाता. इनका उल्लेख गौतम धर्मसूत्र (अध्याय 12, छंद 4-6) में किया गया है. विवाद के बाद खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सफाई देते हुए खुद लिखा कि इस तरह के कठोर प्रावधान गौतम धर्मसूत्र के हैं. 

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सत्ता पक्ष ने खड़गे की व्याख्या को चुनौती दी 

सदन के नेता जेपी नड्डा ने खड़गे के दावों पर सवाल उठाया और उनसे मूल पांडुलिपियों का हवाला देकर इसे साबित करने को कहा. जब बहस तेज हो गई तब राज्यसभा सभापति ने विवादित टिप्पणी को आधिकारिक कार्यवाही से निकालने का आदेश दिया. बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने भी डॉ भीमराव अंबेडकर का हवाला दिया. अंबेडकर की एक किताब में यह तर्क दिया गया है कि अंबेडकर ने वैदिक काल के शूद्रों को वर्तमान अनुसूचित जाति से अलग किया था. यह किताब है "शूद्र कौन थे?"  अंबेडकर की व्याख्या के मुताबिक प्राचीन शूद्र क्षत्रिय थे जो बाद में उपनयन संस्कार से वंचित किए जाने के बाद चौथे वर्ण के बन गए.

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मनुस्मृति को लेकर अलग-अलग विचार 

दरअसल मनुस्मृति में शूद्रों के बारे में जो भी लिखा है उसे लेकर विद्वानों, इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के बीच अलग-अलग विचार हैं. एक पक्ष इसे पूरी तरह भेदभाव करने वाला मानता है तो दूसरा पक्ष इसे गुण-कर्म आधारित काम के बंटवारे की तरफ देखता है.  साथ ही उनका यह भी तर्क है कि पाठ में सदियों से कई संशोधन हुए हैं और बाद में इसकी मूल सामग्री को बदल दिया गया होगा. कई शोधकर्ताओं ने इस बात का तर्क दिया है कि बाद के समय में बड़ी संख्या में छंद जोड़े गए.

जन्म के बजाय कर्म पर केंद्रित 

कर्म आधारित व्याख्या के समर्थक अक्सर मनुस्मृति के अध्याय 10, श्लोक 65 का हवाला देते हैं. इसमें कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति आचरण और योग्यता के जरिए अपना वर्ण बदल सकता है. इस व्याख्या के मुताबिक एक शूद्र ज्ञान और अच्छे कर्मों के जरिए से ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त कर सकता है और एक ब्राह्मण सदाचार के जरिए से वह दर्जा खो सकता है. 

वे पारंपरिक वाक्यांश "जन्मना जयते शूद्र:" का भी जिक्र करते हैं. वे इस बात का तर्क देते हैं कि हर व्यक्ति बिना ज्ञान के पैदा होता है और अकेले जन्म के बजाय शिक्षा और मूल्यों के जरिए प्रगति करता है. यह ध्यान रखना जरूरी है कि विद्वान इस वाक्य और मनुस्मृति के बीच संबंधों के साथ-साथ मनुस्मृति से जुड़े अलग-अलग छंदों की प्रामाणिकता और ऐतिहासिक संदर्भ पर बहस करना जारी रखते हैं. 

संसद में हुए विवाद ने एक बार फिर से आधुनिक भारत में मनुस्मृति की ऐतिहासिक भूमिका, उसकी व्याख्या और प्रासंगिकता पर चल रही बहस को दर्शाया है. हालांकि इस बात पर भी आम सहमति है कि इस ग्रंथ में कुछ ऐसे अंश हैं जो अलग-अलग वर्णों के लिए अलग-अलग कर्तव्य और विशेषाधिकार तय करते हैं. लेकिन आज भी विद्वानों के बीच इसके कई श्लोकों की प्रमाणिकता, संदर्भ और व्याख्या को लेकर मतभेद हैं.

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