Anti Defection Law: 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी को एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा है. दरअसल पार्टी के सात राज्यसभा सांसद ने एक साथ पार्टी छोड़ दी. इनमें राघव चड्ढा भी शामिल हैं. इसी बीच आइए जानते हैं कि 2014 के बाद से अब तक दलबदल कानून कब-कब चर्चा में आया है और किस पार्टी में कब बड़ी फूट हुई है.
दलबदल कानून
2014 के बाद से यह कानून पूरे भारत में राजनीतिक अस्थिरता, सरकारों के गिरने और पार्टियों में फूट पड़ने के मौकों पर बार-बार चर्चा में आया है. 91वें संविधान संशोधन के बाद नियम और भी सख्त हो गए हैं. अब साधारण फूट मान्य नहीं है और सिर्फ दो तिहाई सदस्यों का विलय ही नेताओं को अयोग्यता से बचाता है.
शिवसेना में ऐतिहासिक फूट
सबसे बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल में से एक 2022 में देखने को मिली. दरअसल एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 40 से ज्यादा विधायकों ने शिवसेना से अलग होकर बगावत कर दी थी. इस बगावत की वजह से उद्धव ठाकरे सरकार गिर गई. इसके बाद चली कानूनी लड़ाई ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए थे कि असली शिवसेना कौन है और क्या बाकी विधायकों को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में दखल देना पड़ा जिससे यह हाल के सालों में दलबदल विरोधी कानून से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में से एक बन गया.
एनसीपी में सत्ता परिवर्तन
ठीक 1 साल बाद महाराष्ट्र में एक और राजनीतिक भूकंप आया. अजीत पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक गुट का नेतृत्व करते हुए सत्ताधारी गठबंधन में शामिल होने का फैसला किया. इस घटना ने दलबदल विरोधी कानून के तहत एक नई बहस छेड़ दी. क्या पार्टी के अंदर बहुमत का समर्थन होने का मतलब अयोग्यता से छूट मिलना है? अदालतों ने यह साफ किया कि सिर्फ औपचारिक विलय ही सुरक्षा प्रदान करता है ना कि पार्टी के अंदर का बहुमत.
ज्योतिरादित्य सिंधिया का पार्टी छोड़ना
2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 22 विधायकों के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छोड़ दी थी. सीधे तौर पर दलबदल करने के बजाय इन विधायकों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद कमलनाथ सरकार गिर गई. इस कदम ने बड़ी चालाकी से दलबदल विरोधी कानून को दरकिनार कर दिया.
कर्नाटक में इस्तीफे
कर्नाटक में 2019 में कांग्रेस और जेडी(एस) के 17 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया. इसके कारण एच.डी. कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार गिर गई. हालांकि स्पीकर ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी.
कांग्रेस में अंदरूनी बगावत
2020 में राजस्थान में सचिन पायलट ने कांग्रेस के अंदर ही बगावत की अगुवाई की. यह मुद्दा थोड़ा अलग था. क्या पार्टी के खिलाफ बोलना दलबदल माना जाएगा? यह मामला अदालतों तक पहुंचा जिससे पार्टी अनुशासन और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच संतुलन को लेकर सवाल खड़े हो गए. अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि लोकतंत्र में असहमति की आवाज को दबाया नहीं जा सकता.
दो तिहाई नियम का बार-बार इस्तेमाल
गोवा में दो बड़े मामले देखने को मिले थे. 2019 और 2022 में जब कांग्रेस विधायकों के बड़े समूहों ने दो तिहाई नियम के तहत भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया और इस तरह अयोग्य घोषित होने से बच गए. इसी तरह मणिपुर और तेलंगाना व आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में दलबदल के मामलों पर फैसला लेने में स्पीकरों द्वारा की गई देरी विवादों में घिर गई. इसके बाद अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा था.
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