Protests In POK: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर जिसे पीओके कहा जाता है, वहां पर रावलकोट में इन दिनों हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं. स्थानीय लोग पाकिस्तानी सरकार के तानाशाही रवैये और जबरन नियंत्रण के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं और नाराज हैं. ईदगाह मैदान में आयोजित एक विशाल विरोध प्रदर्शन में जनता का गुस्सा फूटा और उन्होंने कहा कि वे अब पाकिस्तान सरकार की हुकूमत को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे और शरबाज सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उनके अधिकारों को कुचला गया तो वे भारत के साथ हाथ मिलाने को मजबूर हो जाएंगे. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर पीओके पाकिस्तान का हिस्सा बना कैसे, चलिए आपको इस टुकड़े की कहानी बताते हैं.

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कश्मीर के जिस हिस्से पर पाक ने जबरन किया कब्जा?

साल 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो भारत और पाकिस्तान दो अलग-अलग मुल्क बने थे. उस वक्त में कश्मीर एक ऐसी रियासत थी, जिसने कभी भी किसी भी देश के साथ जाने के बजाय पूरी तरह से स्वतंत्र रहने का फैसला किया. लेकिन आजादी के कुछ हफ्तों के बाद ही पाकिस्तान ने अपनी बुरी नीयत दिखा दी. उसने कश्मीरी जमीन को हड़पने के लिए सेना के समर्थन से कबायलियों को आगे करके हमला बोल दिया. यही वह दौर था जब कश्मीर का एक बड़ा टुकड़ा भारत से अलग होकर पाकिस्तान के अवैध कब्जे में चला गया, जिसे आज हम पीओके के नाम से जानते हैं. चलिए इस घटना को विस्तार से समझते हैं कि कब-कब क्या-क्या हुआ.

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महाराजा हरि सिंह का फैसला और पाकिस्तान का धोखा

बंटवारे के वक्त जम्मू-कश्मीर के राजा महाराजा हरि सिंह अपनी रियासत को आजाद रखना चाहते थे. मगर पाकिस्तान इस ताक में था कि कैसे भी करके कश्मीर को अपने पाले में खींच लिया जाए. 22 अक्टूबर 1947 को अचानक हजारों पाकिस्तानी कबायलियों ने हथियारों के साथ कश्मीर की सीमा में घुसपैठ कर दी. ट्रकों में भरकर आए इन हमलावरों को पाकिस्तानी सरकार का पूरा बैकअप मिला हुआ था. इनका मकसद था कि तबाही मचाकर कश्मीर पर जबरन हुकूमत जमा लेना.

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तब महाराजा हरि सिंह ने लगाई मदद की गुहार

पाकिस्तानी घुसपैठिए कश्मीर को रौंदते हुए तेजी से आगे की तरफ बढ़े चले जा रहे थे. जब हालात महाराजा हरि सिंह के काबू से बाहर हो गए, तब उन्होंने दिल्ली से मदद मांगी. उस वक्त भारत सरकार ने साफ कर दिया कि यहां से मदद तभी संभव है जब कश्मीर कानूनी तौर पर भारत का हिस्सा बन जाए. इसके बाद 27 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए. इसके अगले ही दिन भारतीय सेना के जांबाज सैनिकों ने कश्मीर की धरती पर उतरे और उन्होंने दुश्मनों को खदेड़ना शुरु कर दिया.

जब संयुक्त राष्ट्र में पहुंचा कश्मीर का मामला

जब भारतीय फौज पाकिस्तानी कबायलियों को पीछे हटा रही थी, तभी इस विवाद में अंतरराष्ट्रीय दखल हुआ. भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू 1 जनवरी 1948 को इस पूरे मसले को संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर ले गए. साल 1948 के दौरान सुरक्षा परिषद में कश्मीर को लेकर कुल चार प्रस्ताव पारित किए गए. इनमें दोनों देशों से शांति बनाने, एक विशेष कमेटी का गठन करने और विवादित क्षेत्र में जनमत संग्रह कराने जैसी बातें शामिल थीं.

यूएन ने रखी जनमत संग्रह की शर्त

संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में यह तय हुआ था कि कश्मीर की जनता ने राय जानने के लिए वहां जनत संग्रह कराया जाएगा. लेकिन यूएन ने इसके लिए एक बहुत बड़ी लेकिन जरूरी शर्त रखी थी. शर्त यह थी कि पाकिस्तान को सबसे पहले कश्मीर के उन हिस्सों पर अपने कबायलियों और फौज को पूरी तरह से वापस बुलाना होगा, जिन पर उसने कब्जा किया है. लेकिन पाकिस्तान ने कभी भी अपनी सेना को वहां से वापस नहीं बुलाया. ऐसे में भारत ने जनमत संग्रह कराने से साफ मना कर दिया.

सीजफायर और पीओके का जन्म

दिसंबर 1948 में संयुक्त राष्ट्र के कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी, जिसके बाद दोनों देशों के बीच युद्ध रोकने के लिए सीजफायर पर सहमति बनी. जब सीजफायर लागू हुआ, तब तक कश्मीर का करीब 78 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा का इलाका पाकिस्तान के अवैध नियंत्रण में आ चुका था. उस वक्त यह तय हुआ कि जो सेना जहां है, वहीं रुक जाएगी. इस तरह वह कब्जाई गई जमीन पाकिस्तान के पास रह गई, जिसे आज हम पीओके कहते हैं. वर्तमान में इसी इलाके के रावलकोट में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है.

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