India Plastic Notes: भारत एक बार फिर से प्लास्टिक करेंसी नोट लाने की तैयारी कर रहा है. लेकिन यह देश की पहली कोशिश नहीं है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पहले भी दो बार 2010 और 2017 में पॉलीमर बैंक नोट को चलन में लाने की कोशिश की थी. लेकिन दोनों ही बार इन कोशिशों को रोक दिया गया था. अब 2026 में आरबीआई ने एक नई रणनीति के साथ इस प्रोजेक्ट को फिर से शुरू किया है. इस रणनीति में न सिर्फ प्लास्टिक नोट छापने पर ध्यान दिया जा रहा है बल्कि उन्हें भारत में ही बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को भी तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है.
इस मामले में ताजा कदम
दरअसल यह तब शुरू हुआ जब आरबीआई की सब्सिडियरी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड ने देश में ही पॉलीमर सबस्ट्रेट फैक्ट्री लगाने के लिए एक ग्लोबल टेंडर जारी किया. पायलट प्रोजेक्ट के तहत सबसे पहले ₹10 और ₹20 के नोट लाने की उम्मीद है. क्योंकि ये नोट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं और जल्दी खराब हो जाते हैं.
भारत की पहली कोशिश
पॉलीमर बैंक नोट की दिशा में भारत का सफर अप्रैल 2010 में शुरू हुआ था. आरबीआई ने देश भर में अलग-अलग मौसम की स्थिति में प्लास्टिक नोट की मजबूती और परफॉर्मेंस को परखने की योजना बनाई थी. 2012 और 2014 के बीच केंद्रीय बैंक ने ₹10 के एक अरब पॉलीमर नोट के साथ फील्ड ट्रायल का प्रस्ताव रखा था. पायलट प्रोजेक्ट के लिए पांच शहर जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि को चुना गया था. ऐसा इसलिए क्योंकि वहां मौसम की अलग-अलग स्थिति थी. इससे आरबीआई को यह समझने में मदद मिलती की अलग-अलग माहौल में नोट कैसे काम करेंगे. सभी तैयारी के बावजूद भी यह योजना ट्रायल स्टेज से आगे नहीं बढ़ पाई.
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दूसरी कोशिश
यह प्रस्ताव मार्च 2017 में फिर से सामने आया था. केंद्र सरकार ने संसद को बताया कि उसने ₹10 के पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल को एक बार फिर से मंजूरी दे दी है. छपाई के लिए जरूरी पॉलीमर शीट खरीदने की भी मंजूरी मिल गई थी. हालांकि आधिकारिक मंजूरी मिलने के बावजूद भी यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया और आखिरकार पॉलीमर नोटों को चलन में लाए बिना ही इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.
क्या थी इन नाकामियों के पीछे की वजह?
सबसे बड़ी रुकावटों में से एक भारत का बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर था. उस समय ज्यादातर एटीएम, कैश सॉर्टिंग मशीन और वेंडिंग सिस्टम पारंपरिक कॉटन पेपर करेंसी के हिसाब से बनाए गए थे. वह पॉलीमर नोट को सही ढंग से पहचान नहीं पा रहे थे, ना ही उन्हें गिन और जारी कर पा रहे थे. इसी के साथ देश भर में लाखों मशीनों को अपग्रेड करने में काफी ज्यादा निवेश की जरूरत पड़ती है.
इसी के साथ एक और बड़ी चुनौती थी हाई सिक्योरिटी वाले पॉलीमर सबस्ट्रेट के लिए घरेलू प्रोडक्शन सुविधाओं का ना होना. हालांकि भारत के पास कॉटन बेस्ड करेंसी पेपर बनाने का इंफ्रास्ट्रक्चर से पहले से ही था लेकिन सिक्योरिटी ग्रेड पॉलीमर पदार्थ के लिए वह पूरी तरह से विदेशी सप्लायर पर निर्भर था.
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