Swedish East India Company: अंग्रेजों की तरह स्वीडन ने भी भारत में गाड़ा था अपना झंडा, फिर क्यों फ्लॉप हो गई स्वीडिश फैक्ट्री?
Swedish East India Company: साल 1731 में गोथेनबर्ग में बनी स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1733 में तमिलनाडु के पोर्टो नोवो में अपनी पहली फैक्ट्री लगाने की कोशिश की थी. लेकिन उनका प्लान फ्लॉप हो गया.

- आज भारत-स्वीडन ग्रीन टेक्नोलॉजी, AI जैसे क्षेत्रों में साझेदारी कर रहे.
Swedish East India Company: जब भी भारत में किसी विदेशी ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम लिया जाता है, तो दिमाग में तुरंत ब्रिटिश हुकूमत और उनके जुल्मों की कहानी तैरने लगती है. लेकिन भारत के इतिहास का एक ऐसा अनोखा पन्ना भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. 18वीं सदी में सिर्फ अंग्रेज ही नहीं, बल्कि स्वीडन जैसा छोटा यूरोपीय देश भी व्यापार के बहाने भारत की धरती पर कदम रख चुका था. स्वीडन ने तमिलनाडु के तटीय इलाके में अपनी फैक्ट्री खड़ी करने की पूरी तैयारी कर ली थी. लेकिन पहले से पैर जमाए बैठी यूरोपीय ताकतों के आपसी टकराव और भयंकर राजनीतिक दबाव के चलते स्वीडन का यह सपना असमय ही टूट कर बिखर गया.
गोथेनबर्ग के साथ तीन सदियों पुराना नाता
आज लगभग तीन सदियों के लंबे इंतजार के बाद जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वीडन के दौरे पर प्रमुख शहर गोथेनबर्ग में हैं, तो इतिहास का यह पुराना और भूला-बिसरा अध्याय एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है. दरअसल, गोथेनबर्ग ही वह ऐतिहासिक शहर है जहां साल 1731 में स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सबसे पहली नींव रखी गई थी. उस दौर में स्वीडन ग्रेट नॉर्दर्न वॉर यानी एक भीषण युद्ध का सामना करने के बाद बेहद गंभीर आर्थिक संकटों से जूझ रहा था. अपने देश की डूबी हुई अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने और नए व्यापारिक अवसरों की तलाश में स्वीडन के राजा और व्यापारियों ने एशिया के समृद्ध बाजारों की तरफ रुख करने का बड़ा फैसला किया था.
स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी का उदय
साल 1731 में जब स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी का जन्म हुआ, तो इसे यूरोप की आखिरी सबसे बड़ी ईस्ट इंडिया कंपनियों में गिना गया. इस बड़ी महत्वाकांक्षी कंपनी को शुरू करने के पीछे स्कॉटलैंड के मशहूर व्यापारी कोलिन कैंपबेल के साथ निकलास साहलग्रेन और हेनरिक कोनिग जैसे चतुर कारोबारियों का दिमाग काम कर रहा था. स्वीडन की सरकार ने इस कंपनी को केप ऑफ गुड होप के पूर्वी इलाकों में व्यापार करने का एकाधिकार यानी विशेष कानूनी छूट दे दी थी. उस समय पूरे यूरोपीय समाज में भारतीय और एशियाई सामानों जैसे चाय, मसाले और सिल्क की भारी मांग थी, जिसके चलते इस व्यापार में मुनाफे की असीम संभावनाएं थीं.
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गोथेनबर्ग बना यूरोप का अमीर बंदरगाह
एशियाई व्यापार की बदौलत गोथेनबर्ग शहर देखते ही देखते पूरे यूरोप का सबसे समृद्ध और चकाचौंध से भरा बंदरगाह बन गया. स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कुल मिलाकर 37 अत्याधुनिक समुद्री जहाजों के जरिए एशिया की 132 सफल व्यापारिक यात्राएं पूरी की थीं. हालांकि इस व्यापार का सबसे मुख्य केंद्र चीन था, जहां से भारी मात्रा में चाय और चीनी मिट्टी के बर्तन यूरोप लाए जाते थे. इस व्यापार से स्वीडन के अमीर वर्ग में एक नया फैशन चल पड़ा, जहां चाय पीना और एशियाई सामानों का इस्तेमाल करना समाज में ऊंची प्रतिष्ठा की पहचान माना जाने लगा. इस भारी मुनाफे ने स्वीडन की किस्मत बदल दी थी.
तमिलनाडु के तट पर पहली स्वीडिश दस्तक
चीन में बड़ी सफलता हासिल करने के बाद स्वीडन के व्यापारियों ने भारत के साथ सीधे व्यापारिक रिश्ते बनाने की एक बड़ी योजना पर काम शुरू किया. इसी सिलसिले में साल 1733 में Ulrica Eleonora नाम का एक विशाल स्वीडिश समुद्री जहाज भारत के दक्षिणी तट पर आकर रुका. कंपनी ने तमिलनाडु में चेन्नई के पास स्थित पारंगिपेट्टई, जिसे उस जमाने में 'पोर्टो नोवो' कहा जाता था, उसे अपनी पहली व्यापारिक फैक्ट्री लगाने के लिए चुना. यह इलाका रणनीतिक और भौगोलिक रूप से बेहद खास था, क्योंकि यहां से पूरे दक्षिण भारत के व्यापारिक नेटवर्क और मसालों के बाजारों तक पहुंचना बेहद आसान था.
फैक्ट्री पर हुआ ब्रिटिश और फ्रेंच हमला
पोर्टो नोवो में स्वीडिश फैक्ट्री का निर्माण कार्य तेजी से शुरू हो गया, लेकिन यह कामयाबी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकी. भारत में पहले से ही अपना साम्राज्य फैला रहे ब्रिटिश और फ्रेंच व्यापारियों ने स्वीडन की इस मौजूदगी को अपने व्यापारिक हितों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा माना. अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने आपस में हाथ मिलाकर स्थानीय स्तर पर स्वीडिश कंपनी के खिलाफ एक चक्रव्यूह रचा. भयंकर राजनीतिक और सैन्य दबाव बनाकर स्वीडन की फैक्ट्री को जबरन बंद करवा दिया गया. इतना ही नहीं, वहां काम करने वाले कई स्वीडिश कर्मचारियों और अधिकारियों को भी बंधक बनाकर हिरासत में ले लिया गया.
क्यों फ्लॉप हो गया स्वीडन का भारत मिशन?
स्वीडन की फैक्ट्री और उसका भारत मिशन फ्लॉप होने के पीछे कई बड़े ऐतिहासिक कारण जिम्मेदार थे. ब्रिटेन और फ्रांस जैसी महाशक्तियां उस दौर में भारत के राजनीतिक और सैन्य तंत्र पर पूरी तरह हावी हो चुकी थीं, जबकि स्वीडन उनके मुकाबले सैन्य ताकत और संसाधनों के मामले में एक बहुत छोटा खिलाड़ी था. स्वीडन के पास भारत की धरती पर अंग्रेजों की तरह युद्ध लड़ने के लिए न तो विशाल थल सेना थी और न ही स्थानीय राजाओं का समर्थन. इसी सैन्य कमजोरी, कूटनीतिक अनुभव की कमी और यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों की तीखी दुश्मनी के कारण स्वीडन की फैक्ट्री शुरुआती चरण में ही दम तोड़ गई.
मसालों से लेकर टेक्नोलॉजी तक का सफर
सैकड़ों साल पहले तमिलनाडु के तट पर जो व्यापारिक रिश्ता दुश्मनी की भेंट चढ़ गया था, आज पीएम मोदी की इस गोथेनबर्ग यात्रा के जरिए उसे बिल्कुल नए और आधुनिक रूप में ढाला जा रहा है. अब दोनों देशों के बीच बातचीत का मुख्य एजेंडा पुराने जमाने की तरह चाय, कपड़े या मसाले नहीं हैं. आज का भारत और स्वीडन मिलकर ग्रीन टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रक्षा क्षेत्र, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग जैसे भविष्य के आधुनिक उद्योगों पर एक मजबूत और अटूट रणनीतिक साझेदारी का नया इतिहास लिख रहे हैं.
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