NEET Paper Leak Protest: जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ी घोषणा की है. उन्होंने कहा है कि सरकार परीक्षा के पेपर लीक करने के दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाएगी. इस कदम से इन खास अदालतों पर फिर से ध्यान गया है. इन अदालतों को संवेदनशील और काफी जरूरी मामलों में तेजी से न्याय देने के लिए बनाया गया है. आइए समझते हैं कि फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होता है और उनकी कार्यवाही आम अदालत से कैसे अलग होती है.
फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या है?
फास्ट ट्रैक कोर्ट खास अदालतें होती हैं जिन्हें गंभीर आपराधिक मामलों और लंबे समय से लंबित मामलों का तेजी से निपटारा करने के लिए बनाया जाता है. इन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत समय पर न्याय देने के मकसद से बनाया गया है. अनुच्छेद 21 का जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आधार की गारंटी देता है. एक ऐसा अधिकार जिसे अदालतों ने तेजी से न्याय पाने के अधिकार के तौर पर भी समझा है.
यह अदालतें इस सिद्धांत पर काम करती हैं कि न्याय में देरी का मतलब न्याय से इनकार है. हालांकि यह आम अदालतों की तरह ही मुख्य कानून और प्रकिया के नियम को लागू करती हैं लेकिन ये सुनवाई की काफी सख्त और समय सीमा वाली प्रक्रिया का पालन करती हैं.
पूर्व में कुछ ऐसे ही अदालतें महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों के लिए काम कर रही थीं. अब इसी तरह के पेपर लीक और परीक्षा धांधली के मामलों के लिए खास फास्ट ट्रैक अदालतें बनाई जा रही हैं.
फास्ट ट्रैक के गठन की प्रक्रिया
दरअसल इन मामलों को फास्ट ट्रैक करने के लिए सरकार सबसे पहले एक प्रशासनिक ढांचा तैयार करती है. राज्यों और संबंधित हाई कोर्ट को इसके तहत निर्देश दिया जाता है. क्योंकि न्यायपालिका स्वतंत्र है इस वजह से सरकार सीधे तौर पर अदालत शुरू नहीं कर सकती. संबंधित राज्य या फिर उस क्षेत्र के हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से पहले निवेदन किया जाता है.
जैसे ही चीफ जस्टिस का आदेश मिल जाता है एक खास जज को सिर्फ इसी कानून के मुकदमों की सुनवाई के लिए नामित कर दिया जाता है. जैसे ताजा मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के तुरंत बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा कदम उठाते हुए राउज एवेन्यू कोर्ट में अधिकारी अनु ग्रोवर बालीगा की अदालत को विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के रूप में नामित कर दिया है.
देरी रोकने के लिए लगातार सुनवाई
फास्ट ट्रैक कोर्ट और आम अदालत के बीच सबसे बड़ा अंतर कार्यवाही की रफ्तार है. आम अदालत में लंबित मामलों की बड़ी संख्या की वजह से सुनवाई के बीच अक्सर हालातों या फिर महीनों का अंतर हो जाता है. इसके उलट फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई लगातार हर दिन होती है ताकि मुकदमा बिना किसी गैर जरूरी रुकावट के आगे बढ़ता रहे.
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सुनवाई टालने की बहुत कम गुंजाइश
एक बार सुनवाई टालना आम अदालतों में मामलों के लंबित रहने की मुख्य वजह बन चुका है. फास्ट ट्रैक कोर्ट में इस चलन पर काफी रोक होती है. सुनवाई तभी टाली जाती है जब हालात काफी खास या फिर नजरअंदाज ना करने वाले हों. काफी मुश्किल हालातों में भी इसे ज्यादा से ज्यादा दो बार ही टाला जा सकता है.
सिर्फ खास तरह के मामलों की सुनवाई
आम अदालतों के उलट जो कई तरह के आपराधिक विवादों की सुनवाई करती हैं फास्ट ट्रैक कोर्ट सिर्फ चुने हुए मामलों पर ही काम करती हैं जिन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत होती है. इनमें महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध, POCSO एक्ट के तहत मामले, आतंकवाद से जुड़े मामले, बड़े दंगे, भ्रष्टाचार के मामले और सरकार द्वारा काफी जरूरी माने गए दूसरे मामले शामिल होते हैं.
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