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Parliament Session 2026: लोकसभा में सांसदों को कैसे मिलता है बोलने का वक्त, क्या होता है अलॉटमेंट प्रोसेस?

संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण जैसे बड़े विधेयकों पर लंबी बहस जारी है. सदन में हर सांसद अपनी बात रखना चाहता है, लेकिन वहां बोलने का समय मनमर्जी से नहीं मिलता. आइए जानें कि यह समय कैस मिलता है.

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  • स्पीकर की अनुमति से सांसद अतिरिक्त समय पाते हैं.

Parliament Session 2026: संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पर छिड़ी जोरदार बहस के बीच सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच शब्दों के बाण चल रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी जैसे दिग्गज नेताओं ने अपनी बात रखी है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब सदन में सैंकड़ों सांसद मौजूद हों, तो यह कैसे तय होता है कि किसे कितनी देर बोलना है? लोकतंत्र के इस सबसे बड़े मंदिर में अपनी बात रखने का समय अलॉट करने के पीछे एक जटिल प्रक्रिया और सख्त नियम काम करते हैं. चलिए जानें. 

कौन तय करता है लोकसभा में बोलने का समय?

लोकसभा में बोलने का समय निर्धारित करने की जिम्मेदारी 'बिजनेस एडवाइजरी कमेटी' (BAC) की होती है. यह एक शक्तिशाली समिति है जिसमें कुल 26 सांसद शामिल होते हैं. इनमें 15 सदस्य लोकसभा से और 11 सदस्य राज्यसभा से लिए जाते हैं. लोकसभा में इस कमेटी के मुखिया खुद स्पीकर होते हैं, जबकि राज्यसभा में सभापति इसकी अध्यक्षता करते हैं. इस कमेटी की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई भी मंत्री सदस्य नहीं बन सकता है. यह कमेटी ही तय करती है कि किस बिल पर कितनी देर चर्चा होगी और सरकार को कौन सा मुद्दा कब सदन में लाना चाहिए.

सांसदों की संख्या से तय होता है बोलने का वक्त

सदन की कार्यवाही में किस पार्टी का कितना दबदबा होगा, यह गणित सांसदों की संख्या पर टिका होता है. नियम बहुत सीधा है- जिस पार्टी के पास जितने अधिक सांसद होंगे, उसे बहस के दौरान उतना ही ज्यादा समय दिया जाएगा. बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की सलाह पर लोकसभा स्पीकर सभी पार्टियों की सदस्य संख्या के अनुपात में समय का बंटवारा कर देते हैं. यही वजह है कि बड़ी पार्टियों के नेता घंटों तक भाषण देते हैं, जबकि छोटे दलों के सांसदों को अपनी बात रखने के लिए महज कुछ मिनट ही मिलते हैं.

यह भी पढ़ें: Women Reservation Bill: नारी शक्ति वंदन अधिनियम से कितना अलग कांग्रेस का महिला आरक्षण बिल? राहुल गांधी ने किया जिक्र

पार्टियों का चार समूहों में विभाजन

सुविधा के लिए सदन में पार्टियों को चार अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है. 

पहले आते हैं 'बड़े दल', जिनमें कम से कम 15 सांसद होने अनिवार्य हैं. 

दूसरा ग्रुप 'मझले दलों' का है, जिनकी संख्या 5 से 14 के बीच होती है.

तीसरा समूह 'छोटे दलों' का है, जहां सांसदों की संख्या 2 से 4 होती है. 

आखिरी समूह 'निर्दलीय और मनोनीत सदस्यों' का होता है. इन चारों श्रेणियों के लिए समय की अलग-अलग सीमाएं तय होती हैं, जिससे सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चल सके और किसी भी ग्रुप के साथ नाइंसाफी न हो.

कैसे तय होते हैं वक्ताओं के नाम?

जब किसी बिल पर चर्चा शुरू होनी होती है, तो हर पार्टी अपने संभावित वक्ताओं की एक सूची तैयार करती है. यह लिस्ट लोकसभा स्पीकर के पास भेजी जाती है. पार्टी नेतृत्व ही तय करता है कि उसकी तरफ से कौन पहले बोलेगा और कौन बाद में. स्पीकर उसी क्रम में सांसदों को पुकारते हैं. हालांकि, पार्टियों के पास यह अधिकार होता है कि वे ऐन वक्त पर अपने वक्ताओं का क्रम बदल सकें. इस प्रक्रिया से सदन में अनुशासन बना रहता है और पार्टी अपनी रणनीति के अनुसार अपने सबसे मुखर नेताओं को मैदान में उतार पाती है.

बिन बुलाए संसद में बोलने का क्या है रास्ता?

अगर किसी सांसद का नाम उसकी पार्टी की ओर से दी गई लिस्ट में नहीं है, लेकिन वह फिर भी बोलना चाहता है, तो उसके लिए भी नियम हैं. ऐसे सदस्य को व्यक्तिगत रूप से स्पीकर को नोटिस देना पड़ता है. यहां स्पीकर के पास विवेकाधीन शक्ति होती है. यदि उन्हें लगता है कि सांसद का मुद्दा जरूरी है, तो वे अपने अधिकार का उपयोग कर उसे समय दे सकते हैं. इसी तरह, निर्दलीय सांसदों को भी बोलने के लिए स्पीकर को पहले से सूचित करना होता है और उनके समूह के लिए आरक्षित समय में से ही उन्हें बोलने का मौका दिया जाता है.

यह भी पढ़ें: Women Reservation Bill Rahul Gandhi: मनुस्मृति में महिलाओं-दलितों के बारे में क्या लिखा, जिसे लेकर BJP पर फायर हुए राहुल गांधी?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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