गर्मियों के दिनों में जैसे ही सूरज का पारा चढ़ता है, आज के आधुनिक दौर की कंक्रीट वाली छतें भट्टी की तरह तपने लगती हैं. एसी-कूलर चलाने के बाद भी कई घरों की उमस और गर्मी कम होने का नाम नहीं लेती है, लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि पुराने जमाने के गांव के घर, राजा-महाराजाओं की हवेलियां बिना किसी बिजली या एसी के एकदम ठंडी रहती थीं. इसके पीछे कोई जादू नहीं बल्कि विज्ञान का नियम काम करता था, जिसे आज के आर्किटेक्ट्स भी सलाम करते हैं.

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गर्म हवा का सिद्धांत

पुरानें घरों की छतों को 15 से 20 फीट ऊंचा बनाने के पीछे थर्माडायनामिक्स यानि कि गर्मी का सीधा नियम काम करता था. विज्ञान का कहना है कि जब गर्म हवा हल्की होती है तो वह ऊपर की तरफ उठती है और ठंडी हवा हमेशा भारी होने की वजह से नीचे जमीन की सतह पर बनी रहती है. पुराने जमाने में जब कमरे के अंदर गर्मी बढ़ती थी, तब गर्म हवा तुरंत ऊपर छत की तरफ चली जाती थी. इससे फर्श के आसपास का हिस्सा, जहां पर लोग बैठते या सोते थे, हमेशा प्राकृतिक रूप से ठंडा और सुहावना बना रहता था.

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रोशनदानों का वेंटिलेशन

ऊपर उठी हुई गर्म हवा को कमरे से बाहर निकालने के लिए पुराने कारीगर बेहतरीन कूटनीति अपनाते थे. वे ऊंची छतों के ठीक नीचे दीवारों पर छोटे-छोटे रोशनदान बनाते थे, जब नीचे की गर्म हवा ऊपर उठकर छत के पास जमा होती थी तो वह इन रोशनदानों के जरिए बाहर निकल जाती थी. फिर इस खाली जगह को भरने के लिए खिड़कियों से ठंडी हवा अंदर आ जाती थी. हवा के इस लगातार घूमने की प्रक्रिया को क्रॉस वेंटिलेशन कहा जाता था, यह कमरे में उमस नहीं होने देता था.

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प्राकृतिक रोशनी का इंतजाम

पुराने जमाने में तो बिजली नहीं थी, जब बिजली आई तो भी आज की तरह से 24 घंटे लाइट की सुविधा मौजूद नहीं थी. लोग दिन के वक्त सूरज की रोशनी पर निर्भर थे. ऐसे में छतों की ऊंचाई ज्यादा होने की वजह से दीवारों पर बड़े आकार के दरवाजे और ऊंची-ऊंची खिड़कियां बनाने की खूब जगह होती थी. इन्हीं खिड़कियों की वजह से दिन के उजाले में घर के हर कोने में प्रकृतिक रोशनी आसानी से पहुंच जाती थी. इससे दिन में कभी भी घर के अंदर सीलन या अंधेरा नहीं होता था.

उमस और सफोकेशन से आजादी

आजकल के आठ से नौ फीट की छत वाले फ्लैट्स में हवा रुकने की वजह से सफोकेशन यानि घुटन होने लगती है. लेकिन पुराने घरों में ऐसा नहीं होता था. छतों के ऊंचे कमरे होने की वजह से कमरों के अंदर भारी मात्रा में हवा मौजूद रहती थी. इससे कमरे के अंदर रहने वाले लोगों को कभी भी ऑक्सीजन की कमी या घुटन का अहसास नहीं होता है. दीवारों की मोटाई और ऊंची छतों का यह अनोखा तालमेल घर के अंदर के वातावरण को ताजा रखता था. 

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