रूस के पूर्व राष्ट्रपति और पुतिन के विश्वासपात्र दिमित्री मेदवेदेव ने हाल ही में परमाणु हथियारों को लेकर बयान देकर दुनिया की राजनीति में चर्चा बटोरी.  मेदवेदेव ने कहा कि वर्तमान वैश्विक अस्थिरता के कारण कई देश अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में काम कर सकते हैं. उनके अनुसार सामूहिक विनाश के हथियार ही इस समय राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे पक्की गारंटी है. उन्होंने रूस और अमेरिका के बीच न्यू स्टार्ट संधि को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि रूस अपने परमाणु हथियारों के दम पर अपनी संप्रभुता बनाए रखे हुए हैं. मेदवेदेव ने अमेरिका और यूरोप की ओर से लगातार हो रही उकसावे वाली हरकतों का हवाला देते हुए कहा कि रूस ने नई डिलीवरी सिस्टम विकसित किए हैं, जिनमें न्यूक्लियर क्षमता वाले मिसाइल सिस्टम भी शामिल हैं. ऐसे में चलिए अब हम आपको बताते हैं कि किन देशों के राष्ट्राध्यक्ष परमाणु बम से भी सुरक्षित रहेंगे और भारत के पास भी क्या इस तरह की सुविधा है या नहीं. 

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कई देशों में नेताओं के लिए खास न्यूक्लियर बंकर

कई देशों ने परमाणु हमले की स्थिति में अपने राष्ट्राध्यक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए उन्नत बंकर विकसित किए हैं. ये सुविधाएं आम तौर पर जमीन के काफी नीचे बनाई जाती है, भारी मात्रा में कंक्रीट और ग्रेनाइट से ढकी होती है, रेडियोधर्मी विकिरण से बचाव के लिए भी सेफ प्रणाली से सुसज्जित होती है. इन देशों में अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश शामिल है. वहीं यूरोप के कुछ देशों जैसे स्विट्जरलैंड नॉर्वे और फिनलैंड में शीत युद्ध के दौर से ही मजबूत न्यूक्लियर बंकर बनाए गए हैं. इन देशों में अंडरग्राउंड शेल्टर मौजूद हैं, जहां आपात स्थिति में सरकार और शीर्ष नेतृत्व को सुरक्षित रखा जा सकता है. इन बंकरों को परमाणु विस्फोट, रेडिएशन और लंबे समय तक रहने के हिसाब से तैयार किया गया है.

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भारत में क्या है व्यवस्था?

भारत में आम जनता के लिए सार्वजनिक न्यूक्लियर बंकरों की कोई राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं है. देश के ज्यादातर शहरों और कस्बों में ऐसे शेल्टर मौजूद नहीं हैं, जिन्हें परमाणु हमले के समय इस्तेमाल  किया जा सके. हालांकि भारत की सैन्य और रणनीतिक संरचना में कुछ अत्यधिक सुरक्षित अंडरग्राउंड बंकर जरूर है. ये बंकर सेना, स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड और सरकार के शीर्ष नेतृत्व की सुरक्षा और कमांड के लिए बनाए गए हैं. इनका इस्तेमाल केवल रणनीतिक और प्रशासनिक जरूरतों के लिए होता है, आम नागरिकों के लिए नहीं.

मेट्रो टनल्स दे सकती हैं सीमित सुरक्षा

दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों की गहरी मेट्रो टनल्स को लेकर यह माना जाता है कि वे परमाणु हमले के शुरुआती झटकों से कुछ हद तक सुरक्षा दे सकती हैं. लेकिन ये टनल्स न्यूक्लियर फॉलआउट शेल्टर के तौर पर डिजाइन नहीं की गई हैं और इनमें न तो एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम है, न ही लंबे समय तक रहने की व्यवस्था. इसके अलावा भारत का सिविल डिफेंस सिस्टम मुख्य रूप से आपदा के बाद राहत, निकासी और प्राथमिक सहायता पर केंद्रित है. 

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