Noida Protest: नोएडा और फरीदाबाद की सड़कों पर वेतन वृद्धि की मांग को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन देखते ही देखते उग्र हिंसा में बदल गया. गाड़ियों में आगजनी और दफ्तरों में तोड़फोड़ ने आम जनता और व्यापारियों के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जलती हुई गाड़ियों और टूटी हुई इमारतों यानि इन निजी प्रॉपर्टी के नुकसान का हर्जाना कौन भरेगा? कानून अब उपद्रवियों के लिए इतना सख्त हो गया है कि एक गलती उनकी पूरी संपत्ति को दांव पर लगा सकती है.
सड़कों पर संग्राम और उग्र आंदोलन
NCR के दो प्रमुख औद्योगिक केंद्रों, नोएडा और फरीदाबाद में स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है. हजारों कर्मचारी अपनी सैलरी बढ़ाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं. नोएडा के फेज-2 में यह प्रदर्शन तब और हिंसक हो गया जब भीड़ ने अपना आपा खो दिया. प्रदर्शनकारियों ने न केवल काम बंद किया, बल्कि कंपनियों के बाहर खड़े वाहनों को आग के हवाले कर दिया. फरीदाबाद के सेक्टर 37 में भी कंपनियों के बाहर भारी विरोध देखा गया, जिससे औद्योगिक गतिविधियों पर ब्रेक लग गया है.
निजी संपत्ति का नुकसान किसकी जिम्मेदारी?
जब भी कोई आंदोलन हिंसक होता है, तो सबसे ज्यादा चोट निजी संपत्ति को पहुंचती है. नोएडा में जिस तरह से गाड़ियों को जलाया गया और कंपनी की इमारतों में तोड़फोड़ की गई, उसके बाद हर्जाने को लेकर सवाल उठने लाजमी हैं. भारत के कानूनी ढांचे के अनुसार, हिंसा और तोड़फोड़ करने वाले व्यक्ति सीधे तौर पर नुकसान के लिए जिम्मेदार होते हैं. साल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए थे कि अगर किसी उपद्रवी का संबंध किसी हिंसक घटना से साबित हो जाता है, तो उसे नुकसान की भरपाई के लिए कड़ाई से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है.
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उत्तर प्रदेश का सख्त वसूली कानून
उत्तर प्रदेश में संपत्ति के नुकसान की भरपाई के नियम देश के अन्य राज्यों से काफी अलग और सख्त हैं. राज्य सरकार ने 'उत्तर प्रदेश लोक तथा निजी संपत्ति क्षति वसूली अधिनियम, 2020' लागू किया है. इस कानून का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्रदर्शन या दंगे के दौरान होने वाले नुकसान का बोझ सरकारी खजाने पर न पड़े. नोएडा फेज-2 में हुई हिंसा के मामले में भी इसी कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी. इसके अनुसार उपद्रवियों को चिन्हित करके उनसे हर्जाने की वसूली की जाती है.
दोषियों को नोटिस जारी कर संपत्ति कुर्क करने का अधिकार
नुकसान की भरपाई की प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए सरकार ने 'दावा अधिकरण' का गठन किया है. यह ट्रिब्यूनल हिंसा के दौरान हुए कुल नुकसान का सटीक आकलन करता है. घटना के बाद, पीड़ित पक्ष अपना दावा पेश करता है, जिसके बाद ट्रिब्यूनल दोषियों को नोटिस जारी करता है. यदि दोषी पाया गया व्यक्ति हर्जाना भरने में विफल रहता है, तो प्रशासन के पास उसकी निजी संपत्ति कुर्क करने का अधिकार होता है. उत्तर प्रदेश में तो दोषियों के पोस्टर तक सार्वजनिक स्थानों पर लगा दिए जाते हैं.
सिर्फ उपद्रवी नहीं, मास्टरमाइंड भी नपेंगे
कानून की मार केवल उन लोगों पर नहीं पड़ती जो पत्थर फेंकते हैं या आग लगाते हैं, बल्कि आंदोलन के पीछे के दिमाग लगाने वाले मास्टरमाइंड पर भी पड़ती है. यदि यह साबित हो जाता है कि किसी विशिष्ट समूह या व्यक्ति ने भीड़ को हिंसा के लिए उकसाया है, तो उन्हें भी आर्थिक रूप से उत्तरदायी माना जाता है. टोर्ट्स कानून (Law of Torts) के तहत संपत्ति का मालिक इन आयोजकों और उकसाने वालों के खिलाफ सिविल मुकदमा भी दायर कर सकता है, ताकि अपने आर्थिक नुकसान की वसूली की जा सके.
कड़ी सजा और संपत्ति कुर्की का डर
नोएडा और फरीदाबाद में हुई इस हिंसा के बाद पुलिस अब सीसीटीवी और वीडियो फुटेज के जरिए उपद्रवियों की पहचान कर रही है. कानून की मंशा साफ है कि लोकतंत्र में विरोध का हक सबको है, लेकिन हिंसा की छूट किसी को नहीं है. एक बार पहचान होने के बाद, इन प्रदर्शनकारियों को न केवल जेल की हवा खानी पड़ सकती है, बल्कि उनके घर और बैंक खातों पर भी कुर्की की तलवार लटक सकती है.
