भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बीच छिड़ी जुबानी जंग अब गंभीर कानूनी मोड़ ले चुकी है. अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा गड़बड़ी के मामले में आरोपी टिन्नू यादव और सपा प्रमुख अखिलेश यादव को लेकर निशिकांत दुबे द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए दावों ने सियासी पारे को बढ़ा दिया है. अखिलेश यादव ने भाजपा सांसद को अपनी पोस्ट हटाने के लिए महज 10 मिनट की सख्त चेतावनी दी थी, जिसके बाद अब समाजवादी पार्टी ने उनको मानहानि का कानूनी नोटिस भेज दिया है. इस हाई प्रोफाइल मामले में यह चर्चा तेज कर दी है कि क्या वाकई किसी सांसद पर ऐसी पोस्ट के लिए नामजद एफआईआर दर्ज हो सकती है और इसमें कौन सी कानूनी धाराएं लगेंगी, चलिए जानें.

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किसी की छवि खराब करने पर मानहानि का शिकंजा

अखिलेश यादव ने निशिकांत दुबे को मानहानि का कानूनी नोटिस तो भेज ही दिया है. इस मामले में बीएनएस की धारा 356 लगती है. इस कानून के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति या फिर राजनीतिक दल की प्रतिष्ठा को जानबूझकर ठेस पहुंचाने, समाज में उसका सम्मान कम करने या फिर उसकी छवि धूमिल करने के इरादे से कोई भी झूठी बात लिखता है, बोलता है या फिर डिजिटली प्रसारित करता है, तो वह इस धारा के तहत सीधे अपराधी माना जाता है.

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सार्वजनिक शांति भंग करने और अफवाह फैलाने के लिए धारा 353

निशिकांत दुबे की पोस्ट पर बीएनएस की धारा 353 भी जुड़ सकती है. यह धारा मुख्य रूप से सार्वजनिक शांति को भंग करने के लिए फैलाई जाने वाली अफवाहों या भ्रामक जानकारियों पर अंकुश लगाने के लिए बनाई गई है. अयोध्या जैसे बेहद संवेदनशील और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान से जुड़े चढ़ावे के मामले में बिना किसी ठोस सबूत के कोई भी दावा करना समाज में असंतोष या अशांति पैदा कर सकता है.

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आईटी एक्ट की धारा 66

चूंकि यह पूरा विवाद पूरी तरह से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शुरू हुआ है और वहीं से फैला है, इसलिए इस मामले में आईटी एक्ट का लागू होना तो तय है. सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की फर्जी, मनगढ़ंत और भ्रामक जानकारी पोस्ट करना या फिर किसी के खिलाफ दुष्प्रचार करने के जुर्म में आईटी एक्ट की धारा 66 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. इसके तहत कंप्यूटर, मोबाइल या किसी भी अन्य डिजिटल उपकरण के जरिए देश के नागरिकों को गुमराह करने या किसी की पहचान को गलत तरीके से पेश करने पर कड़ी सजा और जुर्माने के प्रावधान है.

कानूनी नोटिस के बाद आगे क्या?

सपा की तरफ से निशिकांत दुबे को भेजे गए कानूनी नोटिस के बाद गेंद निशिकांत के पाले में है. अगर भाजपा सांसद अपनी पोस्ट को लेकर कोई ठोस और प्रमाणिक सबूत पेश नहीं कर पाते हैं या सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगते हैं तो अखिलेश यादव के पास उनके खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराने का पूरा कानूनी अधिकार है.

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