UCC In MP: उत्तराखंड के बाद अब मध्य प्रदेश में यूसीसी बिल पेश किए जाने के साथ ही संपत्ति और पारिवारिक अधिकारों को लेकर प्रदेश भर में चर्चाएं तेज हो चुकी हैं. 20 जुलाई को सदन के पटल पर रखे गए इस ड्राफ्ट में शादी और तलाक के अलावा जायदाद में मिलने वाले हक को लेकर कई बदलाव प्रस्तावित हैं. इस नए ड्राफ्ट के सामने आते ही लोगों के मन में एक सवाल उठा है कि अगर किसी परिवार का वारिस अपना धर्म बदल लेता है तो क्या पिता की जायदाद पर उसका हक सुरक्षित रहेगा कि नहीं. आइए जानें.

Continues below advertisement

धर्म बदलने के बाद पैतृक अधिकारों पर क्या होगा असर? 

समान नागरिक संहिता बिल की धाराओं पर गौर करें तो इससे साफ होता है कि किसी भी शख्स का अपनी पारिवारिक संपत्ति पर हक उसके जन्म से तय होता है. अगर कोई पुत्र अपना धर्म बदल लेता है तो वह अपने जैविक पिता की जायदाद में कानूनी हिस्सेदारी से पूरी तरह से वंचित नहीं होता है. कानून का मूल सिद्धांत यह है कि पारिवारिक संबंध और जन्म से मिलने वाले विरासत के अधिकार किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था बदलने भर से खत्म नहीं किए जा सकते हैं. जब तक पिता जिंदा रहते हुए कोई अलग कानूनी कदम न उठाएं तो तब तक वारिस का हर बरकरार रहता है.

Continues below advertisement

बेटा और बेटी को संपत्ति में बराबर का हक

यूसीसी ड्राफ्ट में लिंग आधारित भेदभाव को पूरी तरह से खत्म करते हुए संपत्ति वितरण में समानता लाने का प्रयास किया गया है. नए नियम कहते हैं कि पिता की संपत्ति में बेटे और बेटी दोनों को कानूनी रूप से बराबर का हकदार माना जाएगा. पहले जहां अलग-अलग पर्सनल लॉ में बेटियों के अधिकारों में असमानताएं देखने को मिलती थीं, वहीं अब यह बिल लागू होने के बाद परिवार में सभी संतानों को समान कानूनी वारिस का दर्जा मिलेगा. इसके लागू होने से लैंगिक आधार पर संपत्ति के बंटवारे में होने वाले भेदभाव पर पूरी तरह रोक लग जाएगी.

यह भी पढ़ें: मुखिया की मृत्यु के बाद संपत्ति के साथ साथ क्या कर्ज का भी होता है बंटवारा, जानिए क्या कहता है कानून?

पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति पर खत्म होता कानूनी अंतर

पारंपरिक पारिवारिक कानूनों में पैतृक जमाने की जायदाद और पिता द्वारा खुद की कमाई से बनाई गई संपत्ति के लिए अलग-अलग नियम होते थे. लेकिन यूसीसी प्रावधान के लागू होने के बाद अंतर काफी हद तक समाप्त हो जाएगा. पिता की मौत के बाद उनकी तमाम संपत्तियां एक ही समान उत्तराधिकार नियम के तहत बांटी जाएंगी. अगर पिता अपनी मौत से पहले कोई रजिस्टर्ड वसीयत नहीं छोड़ते हैं तो उनकी पूरी जायदाद कानूनी वारिसों यानी पत्नी, बच्चों और मां के बीच निष्पक्ष तरीके से बराबर बांट दी जाएगी.

वसीयत लिखकर कानूनी संपत्ति से बेदखल करने की सीमा

हालांकि धर्म बदलने के बाद भी वारिस का हक कानूनी रूप से सुरक्षित रहता है, लेकिन इसमें बड़ी कानूनी शर्त लागू होती है. अगर पिता जीवित रहते हुए कानूनी रूप से एक पंजीकृत वसीयत तैयार करते हैं और उसमें अपने धर्म बदले हुए पुत्र को जायदाद से बेदखल कर देते हैं या फिर अपनी जायदाद किसी और के नाम कर देते हैं तो वैसी स्थिति में बेटे को संपत्ति मिलना बेहद मुश्किल हो जाएगा.

यह भी पढ़ें: दुनिया में किस देश को सबसे ज्यादा मिलता है रेमिटेंस, किन देशों से आता है यह पैसा?