भारत और नेपाल के संबंध हमेशा से रोटी-बेटी के माने जाते रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर खींचतान काफी बढ़ गई है. हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के एक चौंकाने वाले बयान ने इस ठंडे पड़े विवाद की आग को फिर से हवा दे दी है. प्रधानमंत्री ने दावा कर दिया कि सिर्फ भारत ने ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी भारतीय जमीन पर कब्जा किया है. इस एक बयान ने पूरे नेपाल की राजनीति में भूचाल ला दिया है, क्योंकि वहां के जानकार मान रहे हैं कि इससे कालापानी और लिपुलेख पर नेपाल का दावा कमजोर हो गया है. आइए समझते हैं कि दोनों देशों के बीच सीमा का पूरा गणित और इनके बीच विवाद आखिर क्या है.
बालेन शाह के बयान से मचा हड़कंप
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के इस ताजा और अजीबोगरीब बयान ने उनके ही देश में उनके लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है. नेपाल के भीतर सभी राजनीतिक दल और आम सोशल मीडिया यूजर्स प्रधानमंत्री की जमकर आलोचना कर रहे हैं. मामला इतना ज्यादा बढ़ गया कि नेपाल के विदेश मंत्रालय को खुद आगे आकर इस बयान पर आधिकारिक सफाई तक देनी पड़ गई है. नेपाल के सीनियर राजनयिकों का साफ कहना है कि पीएम के इस गैर-जिम्मेदाराना बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कालापानी, लिम्पियाधुरा और सुस्ता जैसे महत्वपूर्ण विवादित क्षेत्रों पर नेपाल के सालों पुराने मजबूत दावे को बेहद कमजोर कर दिया है.
भारत-नेपाल सीमा कितनी बड़ी और किन राज्यों से जुड़ती है?
अगर भौगोलिक नजरिए से देखें तो भारत और नेपाल एक बहुत लंबी और ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय सीमा को आपस में साझा करते हैं. दोनों देशों के बीच की यह सीमा करीब 1,751 किलोमीटर लंबी है और यह पूरी तरह से एक खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जहां लोगों को आने-जाने के लिए किसी वीजा की जरूरत नहीं पड़ती है. भारत के कुल 5 महत्वपूर्ण राज्य नेपाल के साथ अपनी सरहदें मिलाते हैं. इन राज्यों में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम शामिल हैं. आपको बता दें कि इन सभी राज्यों में से बिहार राज्य की सीमा नेपाल के साथ सबसे लंबी दूरी तक सटी हुई है.
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साल 2020 का वो भारत-नेपाल नक्शा विवाद
भारत और नेपाल के बीच सीमा का पुराना विवाद तब पूरी तरह से भड़क उठा जब साल 2020 में भारत सरकार ने देश का एक नया राजनीतिक नक्शा आधिकारिक तौर पर जारी किया था. भारत की तरफ से जारी किए गए इस नए नक्शे में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को पूरी तरह से भारतीय सीमा का हिस्सा दिखाया गया था. भारत का हमेशा से यह साफ दावा रहा है कि ये रणनीतिक इलाके पूरी तरह से उसके हैं. लेकिन नेपाल सरकार ने भारत के इस नक्शे पर बहुत तीखी आपत्ति जताई थी और भारत से अपना राजनीतिक नक्शा तुरंत बदलने की मांग कर डाली थी.
नेपाल ने बदला अपना संविधान
भारत द्वारा नक्शा जारी करने के ठीक पांच महीने बाद, यानी मई 2020 में लिपुलेख क्षेत्र को लेकर दोनों देशों के बीच जमीनी तनाव काफी ज्यादा बढ़ गया. इसके बाद 18 June 2020 को नेपाल सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने संविधान में बाकायदा संशोधन कर दिया और देश के नए राजनीतिक नक्शे को संसद से पास कर दिया. नेपाल के इस नए सरकारी मानचित्र में रणनीतिक रूप से बेहद अहम तीन बड़े क्षेत्रों- लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपनी सीमा के भीतर दिखाया गया था. भारत ने नेपाल के इस कदम को पूरी तरह एकतरफा और गलत बताया था.
महाकाली नदी और सुगौली की संधि
नेपाल की कैबिनेट ने अपने दावों को मजबूत करने के लिए यह बयान जारी किया था कि महाकाली, जिसे शारदा नदी भी कहते हैं, उसका असली स्रोत वास्तव में लिम्पियाधुरा ही है. यह इलाका फिलहाल भारत के उत्तराखंड राज्य का हिस्सा माना जाता है. नेपाल के सर्वे विभाग के पुराने रिकॉर्ड्स के मुताबिक, साल 1850 और 1856 में दोनों देशों ने मिलकर जो नक्शा बनाया था, उसमें सुगौली की संधि के आधार पर महाकाली नदी को ही दोनों देशों की असली सरहद माना गया था, जिससे कालापानी नेपाल का हिस्सा ठहरता है.
भारत का तर्क और ऐतिहासिक सबूत
भारत सरकार नेपाल के इन पुराने नक्शों को सीमा के पुख्ता सबूत के तौर पर स्वीकार करने से हमेशा साफ इनकार करती आई है. भारतीय पक्ष का आधिकारिक तौर पर कहना है कि 1850 के बजाय साल 1875 में जारी किए गए ऐतिहासिक नक्शे पर विचार किया जाना चाहिए. साल 1875 के उस नक्शे में महाकाली नदी का जो उद्गम स्थल यानी शुरुआत दिखाई गई थी, वह कालापानी क्षेत्र के पूर्व में स्थित थी. इसी मजबूत ऐतिहासिक दस्तावेज के आधार पर भारत हमेशा कहता आया है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा के ये तीनों हिस्से पूरी तरह से भारतीय संप्रभुता के अंतर्गत आते हैं.
लिपुलेख की सड़क पर बढ़ा तनाव
यह पूरा विवाद उस समय और ज्यादा आक्रामक हो गया जब भारत सरकार ने मानसरोवर यात्रा को सुगम बनाने के लिए लिपुलेख इलाके में एक नई बॉर्डर रोड का निर्माण कर उसका उद्घाटन कर दिया. लिपुलेख दर्रे से होकर ही तिब्बत चीन के पवित्र मानसरोवर जाने का सबसे मुख्य रास्ता गुजरता है. इस सड़क के बनते ही नेपाल सरकार ने बेहद कड़े शब्दों में भारत का विरोध किया था. नेपाल का आरोप था कि भारत ने उसके अधिकार क्षेत्र वाले लिपुलेख में करीब 22 किलोमीटर लंबी पक्की सड़क का निर्माण कर लिया है, जो कि दोनों देशों के आपसी समझौतों के खिलाफ है.
सुस्ता क्षेत्र का दूसरा बड़ा विवाद
लिपुलेख और कालापानी के अलावा भारत और नेपाल के बीच एक और पुराना सीमा विवाद है, जिसे सुस्ता क्षेत्र का विवाद कहा जाता है. यह इलाका मुख्य रूप से बिहार और नेपाल की सीमा के पास स्थित है. गंडक नदी के लगातार अपना रास्ता बदलने के कारण सुस्ता क्षेत्र की हजारों एकड़ जमीन को लेकर दोनों देशों के किसानों और सरकारों के बीच दशकों से विवाद चल रहा है. दोनों देशों के सर्वे अधिकारी और तकनीकी एक्सपर्ट्स सालों की साझा कोशिशों के बाद भी आज तक कोई ऐसा सर्वसम्मत नक्शा तैयार नहीं कर पाए हैं, जिस पर दोनों देश पूरी तरह राजी हों.
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