ईरान में गिरा परमाणु बम तो क्या भारत तक पहुंच सकता है रेडिएशन, जानें किन-किन देशों को खतरा?
ईरान में परमाणु हमले की स्थिति में भारत को जानलेवा विकिरण का सीधा खतरा नहीं है. लेकिन हवाओं के जरिए रेडियोधर्मी धूल भारत के पश्चिमी राज्यों तक पहुंच सकती है. ऐसे में किस देश को ज्यादा खतरा है.

- परमाणु रिएक्टर पर हमला अधिक खतरनाक, भारत पर आर्थिक-मानवीय संकट.
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चर्चा होने लगी है. अगर ईरान और इजरायल के बीच जंग खतरनाक स्तर पर पहुंचती है और ईरान की धरती पर परमाणु धमाका होता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इसका असर भारत पर भी पड़ेगा? क्या ईरान से उड़ने वाली रेडियोएक्टिव धूल हमारे शहरों तक पहुंचकर तबाही मचाएगी? वैज्ञानिक और रणनीतिक नजरिए से यह समझना जरूरी है कि हवा का रुख और दूरी इस खतरे को कैसे तय करती है.
ईरान में परमाणु धमाका और भारत की दूरी
ईरान के मुख्य परमाणु ठिकानों से भारत की पश्चिमी सीमा की दूरी लगभग 2000 से 2500 किलोमीटर के बीच है. विज्ञान के मुताबिक, किसी भी परमाणु विस्फोट के बाद निकलने वाले सबसे खतरनाक और भारी रेडियोधर्मी कण धमाके वाली जगह से कुछ सौ किलोमीटर के दायरे में ही जमीन पर गिर जाते हैं. इतनी लंबी दूरी तय करते समय रेडिएशन का असर काफी हद तक कम हो जाता है. इसलिए, तकनीकी रूप से भारत में तत्काल एक्यूट रेडिएशन सिकनेस यानी विकिरण से होने वाली गंभीर बीमारी का सीधा खतरा कम नजर आता है.
क्या हवा के जरिए भारत तक होगा असर?
भले ही भारत ईरान से काफी दूर है, लेकिन वायुमंडल में घुले रेडियोधर्मी कणों को हवाएं दूर तक ले जा सकती हैं. अगर हवा का रुख पश्चिम से पूर्व की ओर रहता है, तो परमाणु बादल 48 से 72 घंटों के भीतर भारतीय आसमान तक पहुंच सकते हैं. ऐसी स्थिति में गुजरात, राजस्थान, पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों में रेडियोएक्टिव कणों की मौजूदगी दर्ज की जा सकती है. हालांकि, भारत तक पहुंचते-पहुंचते ये कण इतने फैल और हल्के हो चुके होंगे कि इनसे जानलेवा खतरा होने की आशंका बहुत ही कम रहती है.
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किन देशों के लिए मंडराता बड़ा खतरा
ईरान में अगर कोई परमाणु घटना होती है, तो सबसे ज्यादा तबाही उसके पड़ोसी देशों में देखने को मिलेगी. ईरान के 500 से 1000 किलोमीटर के दायरे में आने वाले इराक, तुर्की, आर्मेनिया, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों को बेहद घातक रेडिएशन का सामना करना पड़ेगा. इन देशों में रेडियोधर्मी धूल (फॉलआउट) सीधे तौर पर लोगों की सेहत और पर्यावरण को बर्बाद कर सकती है. हवा के बहाव के आधार पर इन देशों की सुरक्षा पूरी तरह दांव पर लगी होगी.
खाड़ी देशों और समुद्री पर्यावरण पर संकट
ईरान के दक्षिण में स्थित खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी इस खतरे की चपेट में हैं. अगर ईरान के बुशहर जैसे तटीय परमाणु बिजली संयंत्रों को निशाना बनाया गया, तो रेडियोएक्टिव रिसाव सीधे फारस की खाड़ी और अरब सागर के पानी को जहरीला बना सकता है. इससे समुद्री जीव-जंतुओं के साथ-साथ इन देशों की पेयजल व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा. समुद्री लहरें इस प्रदूषण को भारतीय तटों तक भी पहुंचा सकती हैं.
रिएक्टर पर हमला या बम का फटना- क्या है ज्यादा खतरनाक?
विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु बम फटने की तुलना में चालू परमाणु रिएक्टर या कचरा भंडारण केंद्रों (वेस्ट स्टोरेज) पर हमला करना कहीं ज्यादा खतरनाक होता है. बम का असर कुछ समय बाद कम होने लगता है, लेकिन रिएक्टर से निकलने वाले स्ट्रोंटियम, सीजियम और आयोडीन जैसे तत्व मिट्टी और पानी में मिलकर दशकों तक वहां की आबादी को बीमार कर सकते हैं. यह लंबी अवधि का रेडियोलॉजिकल जोखिम है, जो पूरे क्षेत्र के लिए कैंसर जैसी बीमारियों का बड़ा कारण बन सकता है.
भारत के लिए आर्थिक और मानवीय चुनौतियां
रेडिएशन के अलावा, ईरान में किसी भी परमाणु संघर्ष का भारत पर गहरा आर्थिक असर पड़ेगा. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल और एलपीजी (LPG) के आयात पर निर्भर है, जिसकी सप्लाई चेन इस क्षेत्र से होकर गुजरती है. युद्ध की स्थिति में भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. इसके अलावा, खाड़ी देशों और ईरान के आसपास बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं. वहां किसी भी तरह का परमाणु रिसाव या युद्ध न केवल उनकी जान जोखिम में डालेगा, बल्कि भारत के लिए उनके रेस्क्यू का एक बड़ा संकट खड़ा कर देगा.
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Source: IOCL


























