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क्या लॉ डिग्री लेकर कोई भी शख्स लड़ सकता है अपना केस? ममता बनर्जी पर उठ रहे सवालों के बीच जानें नियम

ममता बनर्जी के कलकत्ता हाईकोर्ट में वकील के लिबास में पेश होने पर कानूनी बहस छिड़ गई है. आइए जानें कि क्या कोई भी कानूनी डिग्री धारक अदालत में अपना केस खुद से लड़ सकता है कि नहीं.

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  • ममता बनर्जी ने लॉ ग्रेजुएट के तौर पर कोर्ट में काला कोट पहना.
  • कानून की डिग्री होने पर भी कोर्ट में खुद की पैरवी कर सकते हैं.
  • केवल बार काउंसिल के पंजीकृत वकील ही काला कोट पहन सकते हैं.
  • वकील के अलावा दूसरों के लिए बहस करना कानून के विरुद्ध है.

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलाव की बयार के बीच पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक नया रूप कलकत्ता हाईकोर्ट में चर्चा का विषय बन गया है. सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद, राज्य में हुई चुनावी हिंसा से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी वकीलों के पारंपरिक काले कोट और गले में सफेद बैंड में नजर आईं. नीले बॉर्डर वाली सफेद साड़ी के साथ इस लॉयर लुक ने न केवल लोगों को चौंकाया, बल्कि कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी. सवाल उठ रहा है कि क्या सिर्फ कानून की डिग्री होना ही अदालत में काला कोट पहनकर पैरवी करने के लिए काफी है? और क्या कोई कोर्ट में खुद की पैरवी कर सकता है.

ममता बनर्जी का कानूनी बैकग्राउंड और विवाद की वजह

ममता बनर्जी केवल एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि उनके पास कानून की औपचारिक डिग्री भी है. अपने चुनावी हलफनामे में उन्होंने साफ किया था कि कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई पूरी की है. इसके अलावा उनके पास इतिहास में बीए, बीएड और इस्लामिक इतिहास में एमए की डिग्रियां भी हैं. हालांकि, विवाद इस बात को लेकर है कि लॉ ग्रेजुएट होना और एक प्रैक्टिसिंग वकील होना, दोनों अलग बातें हैं. कलकत्ता हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस एचसी सुजॉय के सामने उनका वकीलों की तरह काला कोट पहनकर पेश होना अब नियमों के दायरे में परखा जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट में खुद की पैरवी और पार्टी-इन-पर्सन का नियम

यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने अदालत में खुद के लिए मोर्चा संभाला हो. मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी अपनी पैरवी खुद की थी, जो एक रिकॉर्ड है. सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार, किसी भी याचिका को फाइल करने के लिए एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AOR) की जरूरत होती है. लेकिन कानून किसी भी व्यक्ति को पार्टी-इन-पर्सन (अपनी बात खुद रखने वाला पक्ष) बनने की इजाजत देता है. ममता बनर्जी ने भी इसी प्रावधान का उपयोग कर शीर्ष अदालत से अनुमति ली थी और अपनी बात रखी थी. हालांकि, वहां भी डिग्री से ज्यादा अदालत की अनुमति मायने रखती है.

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क्या कोई कानूनी डिग्री लेकर खुद का केस लड़ सकता है?

भारतीय कानून और संविधान हर नागरिक को अपनी रक्षा करने का वैधानिक अधिकार देता है. एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 32 के तहत, अदालत के पास यह शक्ति है कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपने सामने पेश होने और तर्क देने की अनुमति दे सके जो वकील के रूप में पंजीकृत नहीं है. भारत का कानून स्पष्ट करता है कि अपना केस लड़ने के लिए किसी विशेष कानूनी डिग्री या काले कोट की अनिवार्यता नहीं है. कोई भी आम आदमी जज की इजाजत लेकर अपनी पैरवी खुद कर सकता है. लेकिन यहां काला कोट पहनना केवल बार काउंसिल के पंजीकृत वकीलों का विशेषाधिकार माना जाता है.

अदालत में खुद केस लड़ने की प्रक्रिया और सीमाएं

यदि आप अपना केस खुद लड़ना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको संबंधित जज से अनुमति लेनी होती है. अक्सर अदालतें कानूनी जटिलताओं को देखते हुए वकील रखने की सलाह देती हैं, लेकिन यदि आप अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने का भरोसा दिलाते हैं, तो जज इसकी अनुमति दे सकते हैं. इस दौरान आप कागजी कार्यवाही और साक्ष्य जुटाने के लिए उचित समय की मांग भी कर सकते हैं. हालांकि, इसके लिए आपको अदालत की प्रक्रियाओं और कानूनी नियमों की बुनियादी समझ होना आवश्यक है, वरना प्रक्रियात्मक गलतियां केस पर भारी पड़ सकती हैं.

तो क्या दूसरों की भी पैरवी कर सकते हैं?

कानून में एक बहुत ही स्पष्ट सीमा रेखा है. 'पावर ऑफ अटॉर्नी' के माध्यम से आप अपने व्यक्तिगत मामले में अदालत के सामने खड़े हो सकते हैं, लेकिन आप किसी दूसरे व्यक्ति के केस की पैरवी नहीं कर सकते हैं. वकालत करना एक पेशा है, जिसके लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया में रजिस्ट्रेशन और प्रैक्टिस का लाइसेंस अनिवार्य है. बिना लाइसेंस के दूसरों के लिए बहस करना कानूनी रूप से गलत है. ममता बनर्जी के मामले में भी वह खुद से जुड़ी याचिका पर पक्ष रखने पहुंची थीं, लेकिन ड्रेस कोड को लेकर कानूनी जानकारों के मत अलग-अलग हैं.

अदालत में कौन पहन सकता है काला कोट?

अदालत में काला कोट और एडवोकेट बैंड पहनना एक पेशेवर गरिमा का प्रतीक है. सिर्फ डिग्री होने मात्र से इसे पहनने का अधिकार किसी को नहीं है. बार काउंसिल के नियमों के अनुसार, केवल वही व्यक्ति काला कोट और बैंड पहन सकता है जिसके पास 'सनद' या प्रैक्टिस का अधिकार हो. महज लॉ की डिग्री होना किसी को एडवोकेट नहीं बनाता है, वह केवल एक लॉ ग्रेजुएट होता है. विवाद यहीं से खड़ा होता है कि ममता बनर्जी के पास डिग्री तो है, लेकिन यदि वह बार काउंसिल के साथ एक सक्रिय वकील के रूप में पंजीकृत नहीं हैं, तो उनका काला कोट पहनना तकनीकी रूप से नियमों के खिलाफ है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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