Father Surname Tradition: महाराष्ट्र विधानसभा के बजट सत्र के दौरान बच्चों की पहचान और उपनाम का मुद्दा एक बार फिर से चर्चा में आ गया है. सत्र के दौरान राज्य सरकार ने महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 को पेश किया. इसमें कथित अवैध धार्मिक धर्मांतरण से होने वाली शादियों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं. 13 मार्च को पेश किए गए विधेयक के मुताबिक यदि किसी अवैध धार्मिक धर्मांतरण के बाद हुई शादी से कोई बच्चा पैदा होता है तो कानूनी तौर पर उस बच्चे को उस धर्म का माना जाएगा जिसका पालन उसकी मां उस शादी या फिर रिश्ते से पहले करती थी. इसी के साथ विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि इस कानून के तहत अपराध संज्ञेय और गैर जमानती होंगे. इसी बीच आइए जानते हैं कि बच्चों को हमेशा पिता का ही नाम क्यों दिया जाता है और यह कानून कब से चला रहा है.

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पितृसत्तात्मक समाज में गहरी जड़ें

दुनिया भर के ज्यादातर समाजों में ऐतिहासिक रूप से बच्चों को पिता का उपनाम या फिर पहचान विरासत में मिलती रही है. यह प्रथा उस पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना से गहराई से जुड़ी है जिसका प्राचीन और मध्यकालीन समाजों पर राज था. सदियों तक परिवार पुरुष सत्ता के आसपास संगठित थे. इसी के साथ पिता को घर का मुख्य मुखिया माना जाता था. यही वजह है कि परिवार का नाम और पहचान आमतौर पर पुरुष वंश से ही प्राप्त होती थी. हालांकि आपको बता दें कि आधुनिक भारत में यह प्रथा कोई कठोर कानूनी नियम नहीं है. 

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वंश और विरासत से जुड़ाव 

बच्चों का पारिवारिक रूप से अपने पिता का नाम रखने का एक मुख्य कारण विरासत और वंश से जुड़ा हुआ था. ऐतिहासिक रूप से संपत्ति, जमीन, उपाधि और धन आमतौर पर पिता से पुत्र को दिए जाते थे. पिता का उपनाम एक कानूनी और सामाजिक संकेतक के रूप में काम करता था. इसका मतलब था कि बच्चा किसी विशेष पारिवारिक वंश से संबंधित है और संपत्ति विरासत में पाने का हकदार है.

सामाजिक पहचान और वैधता 

पिता के नाम का इस्तेमाल करने का एक और बड़ा कारण सामाजिक मान्यता से जुड़ा था. कई ऐतिहासिक समाजों में बच्चों को पिता के परिवार का हिस्सा माना जाता था. इसी के साथ पिता की पहचान उन्हें सामाजिक वैधता देती थी. पिता के नाम का इस्तेमाल इस बात को पक्का करता था कि बच्चे की पारिवारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक स्थिति को समुदाय के अंदर आसानी से पहचाना जा सके. 

प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ाव 

पिता के वंश के जरिए से बच्चों की पहचान करने की इस परंपरा की जड़ हजारों साल पुरानी है. ऐतिहासिक रिकार्ड बताते हैं कि रोमन साम्राज्य और मेसोपोटामिया जैसे सभ्यता में पितृसत्तात्मक नामकरण प्रणाली मौजूद थी. इन समाजों में पारिवारिक पहचान, संपत्ति का स्वामित्व और नागरिकता पिता के वंश से जुड़ी होती थी. समय के साथ यह प्रथा दुनिया के कई हिस्सों में फैल गई.

आधुनिक युग में औपचारिकरण 

वैसे तो पिता के उपनाम पहले भी मौजूद थे लेकिन 18वीं सदी के दौरान ब्रिटेन और यूरोप के बाकी हिस्सों में यह प्रणाली काफी ज्यादा औपचारिक हो गई. औपनिवेशिक काल के दौरान यह नामकरण प्रणाली भारत में भी काफी मशहूर हो गई. ब्रिटिश प्रशासन के तहत मानकीकृत उपनाम और आधिकारिक रिकॉर्ड की अवधारणा को मजबूती मिली. इसी के साथ कई परिवारों ने बच्चों के लिए लगातार पिता का उपनाम अपनाना शुरू कर दिया. 

कुछ समुदायों में अपवाद 

पितृसत्तात्मक नामकरण परंपराओं के वैश्विक प्रभुत्व के बावजूद भी कुछ समाज मातृसत्तात्मक प्रणाली का पालन करते हैं. यहां पारिवारिक पहचान और संपत्ति मां के जरिए आगे बढ़ती है. भारत में केरल का नायर समुदाय और मेघालय की खासी जनजाति के साथ गारो जनजाति पारंपरिक रूप से ऐसी ही प्रणालियों का पालन करते रहे हैं. इन समुदायों में बच्चे अपनी मां का नाम और संपत्ति विरासत में पाते हैं और वंश का पता मातृ पक्ष लगाया जाता है.

भारत में क्या है स्थिति? 

आधुनिक भारतीय कानून के मुताबिक अब बच्चों के लिए पिता का नाम रखना अनिवार्य नहीं है. कई अदालतों ने इस बात को साफ किया है कि यदि जरूरी हो तो आधिकारिक दस्तावेजों पर सिर्फ मां के नाम का इस्तेमाल किया जा सकता है. भारत के सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के साथ-साथ मुंबई उच्च न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय के फैसलों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि बच्चे की पहचान कानून रूप से सिर्फ पिता पर निर्भर नहीं करती.

सिंगल मदर के अधिकार 

अदालतों ने सिंगल मदर के इस अधिकार को भी मान्यता दी है कि वे अपने बच्चों का पंजीकरण सिर्फ मां के नाम का इस्तेमाल करके करवा सकती हैं. यदि कोई मां के लिए बच्चा का पालन पोषण कर रही है तो उसे जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल में दाखिला और आधिकारिक रिकॉर्ड जैसे दस्तावेजों पर खुद को एकमात्र अभिभावक के रूप में लीस्ट करने की पूरी अनुमति है.

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