लखनऊ में कई सारे नवाब हुए थे, जिनके बारे में तमाम कहानियां कही जाती हैं. लेकिन लखनऊ के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के जीवन का एक ऐसा अनसुना और हैरान कर देने वाला वाकया है, जब उन्होंने एक ही दिन में अपनी 27 बेगमों को एक साथ तलाक दे दिया था. यह फैसला कोई आपसी झगड़े के बाद नहीं लिया गया था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के एक आदेश के खिलाफ नवाब का अनोखा विरोध था. सत्ता छिनने के बाद कलकत्ता के मटियाबुर्ज में तंगहाली से जूझ रहे नवाब ने अंग्रेजों को यह जताने के लिए कदम उठाया था कि अब उनके पास अपनी बड़ी रियासत और हरम का खर्चा उठाने के लिए पैसे नहीं बचे हैं.

सिंहासन छिनने का दर्द और कलकत्ता का सफर 

सन् 1856 में जब अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह को अवध के सिंहासन से बेदखल किया, तो उनका दिल टूट गया. वह अपनी फरियाद लेकर लंदन में महारानी विक्टोरिया के पास जाना चाहते थे. नवाब अपनी मां, भाई और मंत्रियों के साथ कलकत्ता पहुंचे, जहां से उनको पानी के जहाज से इंग्लैंड जाना था. सफर के दौरान उन्होंने अपना मशहूर गीत ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ लिखा. कलकत्ता आकर नवाब का इरादा बदल गया और वे यहीं रुक गए, जबकि उनकी एक बेगम लंदन रवाना हो गईं. उधर 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों ने डरकर नवाब को दो साल के लिए फोर्ट विलियम में कैद कर लिया, क्योंकि उनको अवध में नवाब की लोकप्रियता का खतरा महसूस हो रहा था. 

मटियाबुर्ज में नवाब का विशाल हरम

जेल से छूटने के बाद अंग्रेजों ने नवाब को कलकत्ता के पास हुगली नदी के किनारे मटियाबुर्ज में बंगला नंबर 11 रहने के लिए दिया. इस आलीशान बंगले में पहले कलकत्ता के चीफ जस्टिस और फिर बर्दवान के राजा रह चुके थे. नवाब ने इसका नाम सुल्तान खाना रखा. लखनऊ से उनके साथ आया काफिला बहुत बड़ा था, जिसमें उनकी करीब 365 बीवियां, बच्चे, नौकर-चाकर और दरबारी शामिल थे. इतने सारे लोगों के रहने के लिए यह बंगला छोटा पड़ गया, जिस वजह से नवाब को आसपास के दो और बंगले किराए पर लेने पड़े. इस तरह से मटियाबुर्ज के अंदर ही उन्होंने छोटा सा लखनऊ बना लिया था.

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जब नवाब के बेटे ने अंग्रेजों से की उनकी शिकायत

अंग्रेज नवाब को रहने के लिए हर महीने एक लाख रुपये की पेंशन देते थे. एक राजा की भव्य जीवनशैली और सैकड़ों आश्रितों के खर्च के सामने यह रकम बेहद कम थी. नवाब का गुजारा बहुत मुश्किल से हो पा रहा था. इसी बीच उनकी एक बेगम माशूक महल के बेटेने अंग्रेजों से शिकायत कर दी कि नवाब उसकी मां को भरण-पोषण के लिए पूरे पैसे नहीं दे रहे हैं. इस पर ब्रिटिश अधिकारियों ने नवाब को बिना उनका पक्ष जाने सीधे आदेश सुना दिया कि वह माशूक महल का मासिक खर्चा ढाई हजार रुपये बढ़ा दें. इस दखलअंदाजी से नवाब के आत्मसम्मान को ठेस पहुंची.

एक दिन में 27 बेगमों को दिया तलाक

अंग्रेजों का यह मनमाना रवैया नवाब वाजिद अली शाह को कतई बर्दाश्त नहीं हुआ. उन्होंने इस आदेश का विरोध करने के लिए एक बेहद ही चौंकाने वाला रास्ता चुना. 31 जुलाई 1878 को नवाब ने माशूक महल समेत अपनी 27 बेगमों को एक ही दिन में तलाक दे दिया. उन्होंने ब्रिटिश सरकार को साफ शब्दों में कह दिया कि उनकी माली हालत अब इतनी खराब हो चुकी है कि वह इन बेगमों का खर्चा उठाने में पूरी तरह से असमर्थ हैं. नवाब का यह कदम अंग्रेजों के आर्थिक दबाव और उनक निजी मामलों में की गई दखलअंदाजी के खिलाफ एक मूक लेकिन कड़ा राजनीतिक प्रतिशोध था. 

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