Left Wing & Right Wing: आज लेफ्ट (वामपंथ) और राइट (दक्षिणपंथ) शब्द हम अक्सर राजनीति में सुनते हैं. टीवी डिबेट, अखबार, सोशल मीडिया हर जगह इन शब्दों का यूज होता है. भारत में जहां मार्क्सवादी सोच वाली पार्टियों को वामपंथी कहा जाता है, वहीं परंपरा, संस्कृति और राष्ट्रवाद पर जोर देने वाली पार्टियों को दक्षिणपंथी कहा जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन शब्दों की शुरुआत कैसे हुई. क्या ये शुरू से ही विचारधारा से जुड़े थे. असल में इनका जन्म किसी बड़ी राजनीतिक किताब या सिद्धांत से नहीं, बल्कि इनके जन्म की कहानी बड़ी दिलचस्प है तो आइए जानते हैं कि लेफ्ट और राइट क्या है और कैसे वामपंथ और दक्षिणपंथ का जन्म हुआ.
लेफ्ट और राइट क्या है?
यह कहानी1789 की फ्रांसीसी क्रांति से शुरू हुई है. उस समय फ्रांस में राजा लुई XVI का शासन था और देश में नया संविधान बनाने के लिए एक सभा (नेशनल असेंबली) बैठी थी. सभा में यह बहस चल रही थी कि राजा को कितनी शक्ति दी जाए. इसी मुद्दे पर सदस्य दो हिस्सों में बंट गए. जो लोग राजा और राजशाही के समर्थक थे, वे सभा के राइट ओर बैठ गए. जो लोग राजशाही के विरोधी और बदलाव चाहते थे, वे लेफ्ट ओर बैठ गए. यहीं से राइट (राइट ओर) और लेफ्ट (लेफ्ट ओर) शब्द पैदा हुए.
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कैसे वामपंथ और दक्षिणपंथ का जन्म हुआ?
शुरुआत में ये शब्द सिर्फ बैठने की जगह को दिखाते थे. लेकिन समय के साथ इनका मतलब बदलने लगा. लेफ्ट ओर बैठने वाले लोग बदलाव, समानता और जनता के अधिकारों की बात करते थे. राइट ओर बैठने वाले लोग परंपरा, व्यवस्था और स्थिरता को महत्व देते थे. धीरे-धीरे अखबारों और लोगों ने इन शब्दों का यूज राजनीतिक सोच के लिए करना शुरू कर दिया. जब नेपोलियन बोनापार्ट का शासन आया, तब कुछ समय के लिए लेफ्ट और राइट का यूज कम हो गया, लेकिन 1814 में जब फ्रांस में फिर से संवैधानिक राजशाही आई, तब ये शब्द दोबारा चलन में आ गए.
दुनिया भर में कैसे फैला यह कॉन्सेप्ट?
19वीं सदी तक ये शब्द पूरी तरह राजनीतिक विचारधाराओं के प्रतीक बन चुके थे. फ्रांस से शुरू हुआ यह विचार धीरे-धीरे पूरे यूरोप और फिर दुनिया में फैल गया. 18वीं और 19वीं सदी में यह यूरोप में लोकप्रिय हुआ. 20वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजी बोलने वाले देशों ने भी इसे अपनाया. आज लगभग हर देश में लेफ्ट और राइट का यूज होता है. अब इनका संबंध बैठने की जगह से नहीं, बल्कि सोच और नीतियों से है. धीरे-धीरे ये सिर्फ बैठने की व्यवस्था तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के प्रतीक बन गए, जहां वामपंथ समानता और सामाजिक सुधार पर जोर देता है, जबकि दक्षिणपंथ परंपरा, व्यवस्था और सीमित सरकारी हस्तक्षेप को महत्व देता है.
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