Karnataka Assembly Address Refusal: कर्नाटक एक संवैधानिक और राजनीतिक संकट में फंस चुका है. दरअसल राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 22 जनवरी को होने वाले राज्य विधानमंडल के संयुक्त सत्र को संबोधित करने से मना कर दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्यपाल ने सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण के लगभग 11 पैराग्राफ पर आपत्ति जताई है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या राज्यपाल के भाषण के बिना विधानसभा सत्र कानूनी रूप से शुरू हो सकता है.

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राज्यपाल के भाषण के बारे में संविधान क्या कहता है 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 176 उन परिस्थितियों को बताता है जिनके तहत राज्यपाल का भाषण जरूरी है. राज्यपाल को दो खास मौकों पर विधानसभा या फिर विधानमंडल के दोनों सदनों को संबोधित करना होता है. पहला आम चुनाव के बाद का पहला सत्र और दूसरा हर कैलेंडर वर्ष का पहला सत्र. इन मौका पर राज्यपाल का भाषण सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं होता बल्कि एक संवैधानिक जरूरत होता है.

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इस भाषण का मकसद विधानमंडल को सत्र बुलाने की वजहों के बारे में सूचित करना और चुनी हुई सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं को बताना है. इस भाषण के बिना सत्र की कानूनी शुरुआत को चिन्हित करने वाली संवैधानिक औपचारिकता अधूरी रह जाती है.

क्या राज्यपाल के भाषण के बिना विधानसभा शुरू हो सकती है 

अगर विचाराधीन सत्र साल का पहला सत्र है या फिर चुनाव के बाद पहला सत्र है तो राज्यपाल के भाषण के बिना विधानसभा कानूनी रूप से विधाई कामकाज नहीं शुरू कर सकती. ऐसे सत्र में की गई किसी भी कार्यवाही को अदालत में चुनौती दी जा सकती है और उसे असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है. हालांकि साल के बाकी सत्रों के लिए जैसे कि मानसून या फिर शीतकालीन सत्र जो साल का पहला सत्र नहीं होता, राज्यपाल का भाषण जरूरी नहीं है.

अनुच्छेद 176 को नजरअंदाज करने के कानूनी परिणाम 

अगर संवैधानिक रूप से जरूरी मौके पर राज्यपाल के भाषण के बिना विधायी काम शुरू होता है तो यह एक गंभीर कानूनी कमजोरी पैदा करता है. ऐसे सत्र के दौरान पारित किए गए बिल, की गई चर्चाएं और अपनाए गए प्रस्तावों पर न्यायपालिका के सामने सवाल उठाए जा सकता है. अदालत पूरे सत्र को अमान्य मान सकती है और इसके परिणाम रद्द हो सकते हैं. 

आंशिक या फिर प्रतीकात्मक भाषण 

दरअसल कलकत्ता हाई कोर्ट के 1966 के एक फैसले में कहा गया था कि अगर राज्यपाल सिर्फ भाषण का कुछ हिस्सा पढ़ते हैं या फिर औपचारिक रूप से उसे सदन की मेज पर रखते हैं तो यह संवैधानिक उल्लंघन के बजाय एक प्रक्रियात्मक अनियमितता मानी जाएगी. ऐसे कदम से सत्र अपने आप अमान्य नहीं हो जाता. हालांकि अनिवार्य मौके पर सदन को संबोधित करने से पूरी तरह इनकार करना काफी ज्यादा गंभीर और संवैधानिक रूप से सवाल उठाने वाला है.

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