नेहरू की कूटनीति के कायल थे ये विदेशी नेता, पत्र में लिख दी थी इतनी बड़ी बात
पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेमिसाल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के कायल दुनिया के बड़े-बड़े नेता थे. जानिए विंस्टन चर्चिल से लेकर आइजनहावर तक के पत्रों में छिपे उनके कूटनीतिक किस्से.

आधुनिक भारत के निर्माता और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक नजरिए का लोहा पूरी दुनिया मानती थी. शीत युद्ध के उस बेहद तनावपूर्ण दौर में, जब महाशक्तियां एक-दूसरे के खून की प्यासी थीं, तब नेहरू ने वैश्विक मंच पर भारत की एक निष्पक्ष और शांतिप्रिय छवि पेश की थी. उनकी इस कमाल की कूटनीतिक सूझबूझ के मुरीद सिर्फ उनके दोस्त ही नहीं, बल्कि कट्टर विरोधी समझे जाने वाले विदेशी नेता भी थे. ब्रिटेन के विंस्टन चर्चिल और अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर जैसे बड़े नेताओं ने पत्रों के जरिए नेहरू की शांति नीति की खुलकर तारीफ की थी, जो उनके ऊंचे वैश्विक कद को बयां करता है.
किसने दी शांति दूत की वैश्विक उपाधि
पंडित नेहरू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति के दूत (Messenger of Peace) के रूप में बड़ी मान्यता मिली हुई थी. उनकी इसी खूबी की वजह से सऊदी अरब के तत्कालीन सुल्तान ने उन्हें विशेष रूप से ‘रसूल अल सलाम’ यानी शांति का दूत कहकर नवाजा था. सिर्फ इतना ही नहीं, साल 1956 में जब नेहरू अपने विदेशी दौरे पर गए थे, तब वहां की सड़कों और मंचों पर उनका स्वागत ‘ग्रेट मैसेंजर ऑफ वर्ल्ड पीस नेहरू’ (विश्व शांति के महान दूत) लिखे हुए बड़े-बड़े बैनरों के साथ किया गया था, जो दिखाता है कि दुनिया उन्हें किस कदर सम्मान देती थी.
ऐतिहासिक भाषण की गूंज
भारत की आजादी की आधी रात को दिया गया नेहरू का मशहूर 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' (नियति से साक्षात्कार) भाषण सिर्फ देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बना था. इस भाषण के जरिए नेहरू ने भारत की आजादी को पूरी दुनिया में चल रहे उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों और वैश्विक शांति के साथ बहुत खूबसूरती से जोड़कर पेश किया था. उनके इस दूरदर्शी भाषण और वैश्विक सोच की अंतरराष्ट्रीय मीडिया और दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों ने जमकर सराहना की थी, जिसने भारत को आजादी मिलते ही वैश्विक मंच पर स्थापित कर दिया था.
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गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पूरी दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के दो शक्तिशाली गुटों में बंटकर शीत युद्ध की आग में झुलस रही थी, तब नेहरू ने एक नया रास्ता चुना. उन्होंने यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो और मिस्र के गमाल अब्देल नासिर के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की मजबूत शुरुआत की. इस आंदोलन ने तीसरे विश्व के विकासशील देशों को दोनों महाशक्तियों की गुटबाजी से दूर रखकर युद्ध की संभावनाओं को टालने और दुनिया में शांति का संतुलन बनाए रखने में एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ी भूमिका निभाई थी.
पंचशील का शांति सिद्धांत
नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सुधारने और पड़ोसियों के साथ बेहतर रिश्ते बनाने के लिए 'पंचशील' (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के 5 सिद्धांत) की नीति दुनिया के सामने रखी थी. चीन के साथ हुए समझौते के दौरान दिए गए इन सिद्धांतों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत ज्यादा तारीफ की गई थी. इस सिद्धांत का मुख्य मकसद एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करना और आंतरिक मामलों में दखल न देना था. नेहरू की इस शांति-समर्थक और पूरी तरह न्यूट्रल विदेश नीति के कारण ही 1950 के दशक में उन्हें कई बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया गया था.
बड़े विदेशी नेताओं के पत्र
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल, जो कभी भारत की आजादी के खिलाफ थे, वे भी बाद में नेहरू की कूटनीति के बड़े प्रशंसक बन गए. चर्चिल और अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने अपने निजी पत्रों में नेहरू की वैश्विक शांति की कोशिशों की जमकर तारीफ की थी. इन नेताओं ने माना था कि नेहरू के पास दुनिया की बड़ी समस्याओं को सुलझाने और देशों के बीच मध्यस्थता करने की एक अद्भुत कूटनीतिक क्षमता है. यही वजह है कि इतिहास में नेहरू का नाम एक ऐसे राजनेता के रूप में दर्ज है जिसकी बात को वैश्विक महाशक्तियां भी बेहद गंभीरता से सुनती थीं.
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