कितना हिस्सा बिकने पर सरकारी संस्थान हो जाता है प्राइवेट, कब खत्म होता है सरकार का कंट्रोल?
ISRO Privatization: हाल ही में इसरो के निजीकरण को लेकर कई बड़े सवाल खड़े हो रहे थे. लेकिन इसके बाद इसरो ने अपना स्पष्टीकरण दिया है. इसी बीच आइए जानते हैं कि कोई सरकारी कंपनी कब प्राइवेट होती है.

- इसरो ने निजीकरण से इनकार किया; सरकारी कंपनी में 51% हिस्सेदारी।
- विनिवेश में सरकार आंशिक हिस्सेदारी बेचती है, लेकिन नियंत्रण रखती है।
- रणनीतिक विनिवेश में प्रबंधन नियंत्रण निजी इकाई को हस्तांतरित होता है।
- इसरो का मामला भिन्न; निजी भागीदारी साझेदारी है, निजीकरण नहीं।
ISRO Privatization: भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने यह साफ किया है कि इसका निजीकरण नहीं किया जा रहा है. अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा पारंपरिक रूप से संभाली जाने वाली गतिविधि में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी पर बढ़ती चिंताओं के बीच यह स्पष्टीकरण सामने आया है. यह सरकारी भागीदारी और वास्तविक निजीकरण के बीच अंतर के बारे में एक बड़ा सवाल उठाता है. कोई सरकारी संस्था या फिर कंपनी किस पॉइंट पर प्राइवेट हो जाती है और सरकारी कंट्रोल कब खत्म हो जाता है? आइए जानते हैं इस सवाल का जवाब.
कोई सरकारी कंपनी प्राइवेट कब बन जाती है?
एक सरकारी कंपनी के लिए एक सामान्य नियम के रूप में कंपनी अधिनियम के तहत सरकारी कंपनी के रूप में वर्गीकरण के लिए भुगतान की गई शेयर पूंजी का काम से कम 51% सरकारी स्वामित्व जरूरी है. अगर सरकार अपने हिस्सेदारी इस सीमा से कम कर देती है तो कंपनी सटीक स्वामित्व संरचना और लागू कानून के अधीन सरकारी कंपनी के रूप में खुद को नहीं बता सकती. हालांकि सिर्फ सरकारी शेयर का एक हिस्सा बेचने का मतलब स्वचालित रूप से निजीकरण नहीं है. सरकार कंट्रोल बरकरार रखते हुए अल्पमत हिस्सेदारी को बेच सकती है.

विनिवेश क्या है?
जब सरकार अपने शेयर का एक हिस्सा बेचती है लेकिन कंट्रोल हिस्सेदारी बरकरार रखती है तो इस प्रक्रिया को आमतौर पर विनिवेश के रूप में जाना जाता है. उदाहरण के लिए अगर सरकार किसी कंपनी का 70% हिस्सेदारी रखती है और 15% बेचती है तब भी उसके पास 55% की हिस्सेदारी है. ऐसे में हिस्सेदारी बिक्री के बावजूद सरकारी स्वामित्व और प्रबंधन कंट्रोल जारी रह सकता है.
रणनीतिक विनिवेश या निजीकरण क्या है?
रणनीतिक विनिवेश में सरकार द्वारा एक निजी खरीदार या फिर रणनीतिक निवेश को प्रबंधन नियंत्रण हस्तांतरित करने के साथ-साथ पर्याप्त हिस्सेदारी बेचना शामिल है. इस वजह से जरूरी कारक सिर्फ बेचे गए शेयर का प्रतिशत नहीं है बल्कि यह भी है कि क्या कंपनी का कंट्रोल बदल गया है. एक बार जब एक निजी इकाई कंट्रोल स्वामित्व और प्रबंधन प्राधिकरण प्राप्त कर लेती है तो कंपनी प्रभावी रूप से सरकारी कंट्रोल से निजी कंट्रोल की तरफ बढ़ सकती है.
सरकारी कंट्रोल कब खत्म होता है?
सरकारी कंट्रोल तब खत्म हो सकता है जब एक निजी संस्था पर्याप्त स्वामित्व और मतदान शक्ति प्राप्त कर लेती है और सरकार अपना प्रबंधन अधिकार छोड़ देती है. परिवर्तन खास तौर से जरूरी तब हो जाता है जब सरकार के पास निदेशक मंडल की नियुक्ति या कंट्रोल करने का प्रमुख प्रबंधन फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रह जाती है. पूर्ण निकास इसका साफ उदाहरण है. जब सरकार अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच देती है तो उसके पास स्वामित्व या फिर प्रबंधन कंट्रोल नहीं रह जाता.

26% सीमा का क्या महत्व है?
कंट्रोल की सीमा तय करने में एक और जरूरी बिंदु है. कंपनी कानून के तहत 26% या ज्यादा मतदान शक्ति रखने वाला शेयरधारक कुछ स्थिति में एक खास प्रस्ताव को रोक सकता है क्योंकि ऐसे प्रस्तावों के लिए मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम 75% वोटों की जरूरत होती है. इस वजह से 26% हिस्सेदारी बरकरार रखने वाली सरकार के पास खास समाधान की जरूरत वाले कुछ प्रमुख कॉर्पोरेट फैसलों को रोकने की क्षमता हो सकती है भले ही उसके पास अब बहुमत न हो.
हालांकि इसे सामान्य प्रबंधन कंट्रोल के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए. 26% शेयरधारक कंपनी के दैनिक संचालन या बोर्ड को स्वचालित रूप से कंट्रोल नहीं करता है. अगर सरकार की हिस्सेदारी 26% से कम हो जाती है तो उसकी शेयर धारिता के जरिए से यह अवरोध शक्ति आमतौर पर खो जाती है.
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इसरो का मामला अलग क्यों?
इसरो से जुड़ी बहस को किसी सरकारी कंपनी के प्राइवेटाइजेशन से अलग हटकर समझने की जरूरत है. इसरो एक सरकारी स्पेस एजेंसी है, ना कि कोई आम सरकारी कंपनी जिसकी ओनरशिप सिर्फ शेयर बेचकर होती है.
प्राइवेट स्पेस कंपनियों की बढ़ती भूमिका का मतलब यह नहीं है कि इसरो का प्राइवेटाइजेशन हो गया है. पार्टनरशिप, कॉन्ट्रैक्ट, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट और कमर्शियल स्पेस गतिविधियों के जरिए प्राइवेट भागीदारी बढ़ सकती है.
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