Israel  Elections: इजरायली मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इजरायल के चुनाव में सभी वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है. 120 सदस्यों वाली नेसेट में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलीं, विपक्षी दलों ने 48 सीटें जीतीं और अरब दलों को 19 सीटें हासिल हुईं. नितिन याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी एकल पार्टी बनकर उभरी. हालांकि ना तो गठबंधन और ना ही विपक्षी गुट संसदीय बहुमत के लिए जरूरी  61 सीटों के आंकड़ों तक पहुंच सका, जिससे सत्ता का संतुलन अनिश्चित बना हुआ है. 

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इजरायल अकेला नहीं है. कई देशों में चुनावों के बाद ऐसी संसद बनती है जिसमें किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता. सरकार बनाने के लिए पार्टियों को आपस में बातचीत करनी पड़ती है और अपनी सीटों को मिलाकर गठबंधन बनाना पड़ता है. 

एकल पार्टी बहुमत मुश्किल क्यों है?

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इसकी एक मुख्य वजह प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन प्रणाली है. इस व्यवस्था के तहत संसदीय सीट हर पार्टी को मिले वोटों के अनुपात में बांटी जाती है. इस वजह से छोटी पार्टियां भी प्रतिनिधित्व हासिल कर सकती हैं. इससे सीटें कई राजनीतिक समूहों में बंट जाती हैं. इससे किसी एक पार्टी के लिए कुल सीटों के आधे से ज्यादा के आंकड़े तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है. 

जर्मनी में गठबंधन समझौतों का महत्व 

जर्मनी में गठबंधन सरकार चलती है. वहां की मिक्सड मेंबर प्रोपोर्शनल चुनावी प्रणाली की वजह से किसी एक पार्टी के लिए अकेले सरकार चलाने लायक सीट जीतना मुश्किल होता है. आमतौर पर दो या फिर तीन पार्टियां मिलकर एक गठबंधन समझौता करती हैं. यह सरकार बनाने का आधार बनता है और इस बात को तय करता है कि वे साथ मिलकर कैसे काम करेंगी. 

इटली का बिखरा हुआ राजनीतिक परिदृश्य

इटली में बहुदलीय प्रणाली है और यह राजनीतिक अस्थिरता के लिए जाना जाता है. वहां की चुनावी व्यवस्था के कारण संसद में अलग-अलग आकार के की दल और गुट आ जाते हैं. आजादी के बाद से शायद ही कभी किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला हो. यही वजह है कि इटली की राजनीति में गठबंधन सरकार एक आम बात रही है.

नीदरलैंड 

नीदरलैंड में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू है. वहां संसद में एक सीट जीतने के लिए काफी कम वोटों की जरूरत होती है. इस वजह से दर्जनों में छोटी पार्टियों को भी रिप्रेजेंटेशन मिल जाता है. चुनाव के बाद पार्टियां अक्सर गठबंधन सरकार बनाने पर सहमत होने से पहले महीनों तक बातचीत करती हैं.

बेल्जियम में भाषाई और राजनीतिक विभाजन 

बेल्जियम की राजनीति डच भाषी और फ्रेंच भाषी क्षेत्र के बीच बंटवारे की वजह से काफी मुश्किल है. भाषा संबंधी यह अंतर किसी एक दल के लिए पूरे देश में बहुमत हासिल करना नामुमकिन बना देता है. सरकार बनाने में 1 साल से ज्यादा का समय लग सकता है और गठबंधन में अक्सर 6 या फिर 7 दल शामिल होते हैं. 

स्विट्जरलैंड का मैजिक फॉर्मूला

स्विट्जरलैंड में आम सहमति पर आधारित एक खास व्यवस्था अपनाई जाती है. इसे मैजिक फॉर्मूला कहा जाता है. 1959 से संसद के चार सबसे बड़े दल मिलकर शासन चलाते आ रहे हैं. इस व्यवस्था में किसी एक दल के पास पूर्ण बहुमत होने के बजाय शासन की जिम्मेदारी दलों के बीच बांट दी जाती है. 

न्यूजीलैंड में प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन की तरफ बदलाव 

पहले न्यूजीलैंड में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट वाली चुनावी प्रणाली थी. यह यूनाइटेड किंगडम की प्रणाली के जैसी ही थी. 1996 में उन्होंने मिक्सड मेंबर प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन प्रणाली को अपनाया. इस बदलाव के बाद से किसी एक दल के बहुमत वाली सरकार लगभग खत्म हो गई और गठबंधन की राजनीति आम हो गई. इसमें सरकार चलाने के लिए दल अपनी सीटों को मिलाकर गठबंधन बनाते हैं.

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गठबंधन सरकार के फायदे और जोखिम 

गठबंधन सरकार समाज के अलग-अलग वर्ग जिनमें छोटे वैचारिक समूह भी शामिल होते हैं, को सरकार में रिप्रेजेंटेशन दे सकती है. दलों को आपस में बातचीत करने और सत्ता साझा करने की जरूरत होने से मनमाने या फिर बेलगाम शासन का जोखिम भी कम हो सकता है.

हालांकि गठबंधन सरकार अस्थिर हो सकती है. सरकार को सत्ता में बनाए रखने के लिए अलग-अलग प्राथमिकताओं वाले दलों को अपना समझौता कायम रखना पड़ता है. अगर कोई एक छोटा दल भी अपना समर्थन वापस ले लेता है तो सरकार गिर सकती है या फिर देश को बार-बार चुनाव का सामना करना पड़ सकता है. यह जोखिम तब और साफ तौर पर दिखाई देता है जब संसद में दलों की सीटों की संख्या काफी करीब हो.

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