पश्चिम एशिया के भीषण संघर्ष के बाद इजरायल में राष्ट्रीय चुनावों की सरगर्मियां काफी तेज हो गई हैं. मंगलवार को होने जा रहे इस ऐतिहासिक मतदान को देश के हालिया इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण चुनाव माना जा रहा है. अक्टूबर 2023 में हुए हमास के हमले और फिर गाजा, लेबनान तथा ईरान के साथ चले तीन साल के लंबे युद्ध के बाद इजराइली जनता पहली बार नई सरकार चुनने के लिए मतदान करेगी. यह चुनाव न केवल इजरायल की भावी सुरक्षा और राजनीतिक दिशा तय करेगा, बल्कि सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक किस्मत का फैसला भी करेगा. आइए जानें कि भारत की चुनाव प्रणाली और इजरायल की चुनाव प्रणाली में क्या अंतर है.

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इजरायल का राजनीतिक संकट और चुनाव

गाजा और आसपास के इलाकों में तीन साल तक चले भीषण युद्ध और तनाव के बाद हो रहा यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक बन गया है. इस समय देश के सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं. हालांकि, इस बार उन्हें कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट की अगुआई वाली 'यशार' पार्टी को मतदाताओं का भारी समर्थन मिल रहा है. दोनों प्रतिद्वंद्वियों के बीच कांटे की टक्कर होने से पूरा मुकाबला बेहद दिलचस्प और अनिश्चित हो गया है.

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पूरे देश को एक निर्वाचन क्षेत्र मानने की व्यवस्था

इजरायल की चुनाव प्रक्रिया दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों की तुलना में काफी अलग है. यहां भारत की तरह अलग-अलग लोकसभा या विधानसभा सीटें नहीं होतीं, बल्कि पूरा का पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है. नागरिक किसी स्थानीय नेता को व्यक्तिगत रूप से वोट नहीं देते, बल्कि वे अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी का चुनाव करते हैं. मतदान प्रक्रिया के लिए कार्डबोर्ड की गोपनीय स्क्रीन का उपयोग होता है, जहां मतदाता अपनी मनपसंद पार्टी के हिब्रू अक्षरों वाली पर्ची को लिफाफे में बंद करके मतपेटी में डालते हैं.

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संसद का ढांचा और इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड

इजरायल की राष्ट्रीय संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं. किसी भी राजनीतिक दल को संसद में प्रवेश पाने और सीटें हासिल करने के लिए कुल पड़े राष्ट्रीय मतों का कम से कम 3.25 प्रतिशत हिस्सा हासिल करना अनिवार्य होता है. इस न्यूनतम सीमा को इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड कहा जाता है. देश में सरकार बनाने के लिए किसी भी गठबंधन या दल के पास कम से कम 61 सदस्यों का बहुमत होना जरूरी होता है. इजरायल के इतिहास में आज तक किसी एक पार्टी को अकेले पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, इसलिए वहां हमेशा साझा सरकारें ही बनती आई हैं.

ओपिनियन पोल के आंकड़े और नतीजों के संकेत

चुनाव प्रचार थमने से ठीक पहले आए अंतिम ओपिनियन पोल से साफ हो गया है कि इस बार भी किसी एक गुट को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला है. सर्वे के अनुसार, आइसेनकोट की 'यशार' पार्टी को नेतन्याहू की 'लिकुड' पार्टी पर मामूली बढ़त मिलती दिख रही है. आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू के गुट को करीब 50 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है, जबकि विपक्षी दलों को 52 से 56 सीटें मिल सकती हैं. ऐसे में 14 से 16 सीटें हासिल करने का अनुमान रखने वाली अरब पार्टियां नई सरकार के गठन में बेहद निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं.

इजराइल में मतदाताओं के प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

इजराइली नागरिकों के लिए इस बार के चुनाव में मुख्य मुद्दे काफी स्पष्ट हैं. एक मीडिया सर्वे के अनुसार, लगभग 34% मतदाताओं के लिए देश की चरमराती अर्थव्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है, जबकि 32% लोग राष्ट्रीय सुरक्षा को पहली प्राथमिकता मानते हैं. इसके अलावा, समाज में एक और बड़ा विवादित विषय चर्चा में है. देश के अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों को सेना में अनिवार्य सेवा से छूट मिलनी चाहिए या उन्हें भी अनिवार्य रूप से सेना में शामिल किया जाना चाहिए, इस सवाल पर भी देश का जनमत विभाजित दिखाई दे रहा है.

भारत और इजरायल की चुनाव प्रणाली में अंतर

भारत और इजरायल की मतदान प्रणाली में सबसे बड़ा अंतर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM का है. भारत में जहां ईवीएम से वोट डाले जाते हैं, वहीं इजरायल में आज भी पूरी तरह से कागज की पर्चियों के जरिए ही गुप्त मतदान होता है. वहां आखिरी वोट डाले जाने के तुरंत बाद ही बिना किसी देरी के मतगणना शुरू कर दी जाती है. नियम इतने लचीले हैं कि एक क्षेत्र में वोटिंग जारी रहने के दौरान भी अन्य जगहों पर वोटों की गिनती शुरू की जा सकती है. इसी वजह से 28 अक्टूबर तक चुनाव के प्राथमिक नतीजे बिल्कुल साफ हो जाएंगे.

कैसे होता है सरकार का गठन?

चुनाव के अंतिम और आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को जारी किए जाएंगे. इसके बाद राष्ट्रपति सबसे ज्यादा समर्थन हासिल करने की संभावना रखने वाले नेता को नई सरकार बनाने का न्योता देते हैं. नामांकित नेता को गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिनों की समयसीमा दी जाती है, जिसे विशेष परिस्थितियों में 14 दिन के लिए और बढ़ाया जा सकता है. अगर निर्धारित अवधि में कोई भी नेता 61 सदस्यों का समर्थन जुटाने में नाकाम रहता है, तो देश को दोबारा चुनाव में जाना पड़ता है. नई सरकार बनने तक पुरानी सरकार ही कार्यवाहक के रूप में काम संभालती है.

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