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क्या होने जा रहा तीसरा विश्व युद्ध, जानें अब कौन किधर होगा खड़ा; अमेरिका-ईरान के साथ कौन?

इस्लामाबाद शांति वार्ता की विफलता और होर्मुज स्ट्रेट की अमेरिकी नाकेबंदी ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है. वैश्विक शक्तियों का दो स्पष्ट गुटों में बंटना और तेल आपूर्ति का ठप होना संकट का संकेत है.

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  • अमेरिका ने ईरान से शांति वार्ता की विफलता पर होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी की.
  • कई यूरोपीय देशों ने अमेरिकी नौसैनिक घेराव का समर्थन करने से इनकार कर दिया.
  • ईरान ने नाकेबंदी को 'समुद्री लूट' बताते हुए परमाणु हथियार की धमकी दी.
  • यह संघर्ष दुनिया को अमेरिका और रूस-चीन गुटों में बांट सकता है.

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिकी नौसेना की पूर्ण नाकेबंदी ने वैश्विक महायुद्ध की आहट तेज कर दी है. इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति की आखिरी कोशिश नाकाम होने के बाद अब कूटनीति की जगह मिसाइलों ने ले ली है. जिस रास्ते से दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है, वहां युद्ध की चिंगारी भड़कना केवल मध्य पूर्व का संकट नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर तीसरे विश्व युद्ध का अलार्म है.

शांति वार्ता की विफलता और नाकेबंदी

12 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच आयोजित शांति वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई. इस असफलता के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट में ईरानी बंदरगाहों पर 'टोटल मैरीटाइम ब्लॉकेड' यानी पूर्ण समुद्री नाकेबंदी का कठोर आदेश जारी कर दिया. अमेरिकी नौसेना ने इस जल मार्ग को चारों ओर से घेर लिया है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा माना जाता है. इस कदम से न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार हुआ है, बल्कि पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट और तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी का खतरा पैदा हो गया है.

अमेरिका का अलग-थलग पड़ता खेमा

दिलचस्प बात यह है कि पिछले खाड़ी युद्धों के विपरीत इस बार अमेरिका अंतरराष्ट्रीय मंच पर काफी हद तक अकेला दिखाई दे रहा है. नाटो के प्रमुख सहयोगी देश जैसे जर्मनी, इटली और स्पेन ने इस बार अपनी नौसेना भेजने से साफ इनकार कर दिया है. इन यूरोपीय देशों को डर है कि युद्ध की स्थिति में उनकी ऊर्जा जरूरतें पूरी नहीं हो पाएंगी और महंगाई नियंत्रण से बाहर हो जाएगी. वर्तमान में केवल इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ही अमेरिका के साथ सक्रिय सैन्य समन्वय कर रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र में भी रूस और चीन के वीटो के कारण अमेरिका को इस कार्रवाई की कानूनी मंजूरी नहीं मिल सकी है.

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ईरान का पलटवार और परमाणु खतरा

ईरान ने इस नाकेबंदी को 'समुद्री लूट' करार दिया है और अपनी 'लाल रेखा' स्पष्ट कर दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आर्थिक दबाव असहनीय हुआ, तो ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) की शर्तों से बाहर निकलकर यूरेनियम संवर्धन को 90 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है. यह कदम सीधे तौर पर परमाणु युद्ध को आमंत्रण देने जैसा होगा. इसके अलावा, ईरान का 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' जिसमें हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया शामिल हैं, अब पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं. वे क्षेत्र में मौजूद हर अमेरिकी ठिकाने को निशाना बनाने की तैयारी में हैं, जिससे युद्ध कई मोर्चों पर फैल सकता है.

दो ध्रुवों में बंटती जा रही दुनिया

अगर यह तनाव महायुद्ध में बदलता है, तो दुनिया स्पष्ट रूप से दो गुटों में बंटी नजर आएगी. अमेरिकी खेमे में ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देश शामिल हो सकते हैं, जो पश्चिमी लोकतंत्र और पुरानी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. दूसरी ओर, ईरान के पीछे रूस, चीन और उत्तर कोरिया जैसी ताकतें खड़ी हो सकती हैं. ये देश लंबे समय से अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने की ताक में हैं. पाकिस्तान की स्थिति भी इस बार महत्वपूर्ण होगी, जिसका झुकाव अमेरिका के बजाय अपने रणनीतिक साझेदार चीन और पड़ोसी ईरान की ओर हो सकता है.

साइबर युद्ध और डिजिटल पर्ल हार्बर

तीसरे विश्व युद्ध का खतरा केवल मिसाइलों और जहाजों तक सीमित नहीं है. रक्षा विशेषज्ञ 'डिजिटल पर्ल हार्बर' की चेतावनी दे रहे हैं. ईरान समर्थित साइबर संगठन पश्चिमी देशों के बैंकिंग सिस्टम, पावर ग्रिड और संचार व्यवस्था को पूरी तरह ठप करने की क्षमता रखते हैं. एक ओर जहां समुद्र में जहाजों को रोका जा रहा है, वहीं दूसरी ओर डिजिटल स्पेस में अदृश्य युद्ध शुरू हो चुका है. यह हाइब्रिड वॉरफेयर पूरी दुनिया की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता को मिनटों में खत्म कर सकता है.

आर्थिक महाविनाश की आहट

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के लिए इस लंबी नाकेबंदी का खर्च उठाना बेहद महंगा साबित हो रहा है, जो ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. यदि होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बंद रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग पूरी तरह ठप हो जाएंगे. ग्लोबल साउथ के देश, जो पहले से ही कर्ज और महंगाई से जूझ रहे हैं, इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत चुकाएंगे. यह संघर्ष अब केवल दो देशों की आपसी लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक तबाही का प्रारंभिक चरण प्रतीत होता है, जहां हर कदम विनाश की ओर बढ़ रहा है.

यह भी पढ़ें: अमेरिका जैसी महाशक्ति के सामने कैसे डटा है ईरान, जानें कैसे मदद कर रहे रूस और चीन?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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