मध्य पूर्व के देश ईरान में पिछले दो हफ्तों से भारी विरोध प्रदर्शन जारी हैं. लोग सरकारी नीतियों और शासन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं. देश के करीब 200 शहरों तक ये प्रदर्शन फैल चुके हैं. विभिन्न सामाजिक संस्थाओं की जानकारी के अनुसार अब तक 500 से ज्यादा लोगों की जान गई है और 10,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. इनमें आम नागरिकों के साथ-साथ सुरक्षा बलों के भी शामिल होने की खबरें हैं. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि क्या ईरान भारत से भी कर्जा लेता है? अगर हां…तो फिर उसे वापस कैसे करता है?

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सीधे कर्ज नहीं, व्यापार आधारित भुगतान

ईरान आम सरकारी कर्ज की तरह भारत से पैसे नहीं लेता, बल्कि दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते मुख्य रूप से व्यापार और भुगतान पर आधारित हैं. भारत ईरान से तेल खरीदता रहा है और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण सीधे डॉलर या यूरो में भुगतान करना मुश्किल हो गया.

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तेल क्रेडिट और रुपये का इस्तेमाल

अतीत में भारत ने ईरान से काफी कच्चा तेल आयात किया. पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते भारत अपने तेल भुगतानों को सामान्य अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनलों (जैसे डॉलर या यूरो) के माध्यम से नहीं कर पा रहा था. इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय तेल रिफाइनरी कंपनियों का ईरान के प्रति अरबों डॉलर का भुगतान बकाया रह गया.

इसी समस्या का समाधान करने के लिए रुपया भुगतान व्यवस्था शुरू की गई. भारत ने अपनी तेल देनदारी का हिस्सा भारतीय रुपयों में जमा कराया, जो ईरान की कुछ विशेष भारतीय बैंक शाखाओं जैसे UCO बैंक में रखे गए. इस व्यवस्था के तहत नकद डॉलर के बजाय रुपये का इस्तेमाल हुआ, जिससे दोनों देशों के व्यापार में रुकावट नहीं आई.

ईरान ने रुपयों का किया इस्तेमाल

ईरान ने अपने इन जमा रुपयों का इस्तेमाल भारत से खाद्य सामग्री, दवाइयां और अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदने में किया. इसका मतलब यह हुआ कि भारत को नकद रूप में कर्ज नहीं देना पड़ा, बल्कि भुगतान व्यापारिक और वस्तु आधारित लेन-देन के जरिए हुआ.

परियोजना आधारित निवेश 

भारत ने ईरान में कुछ विशेष परियोजनाओं के लिए निवेश और क्रेडिट लाइनें भी दी हैं, लेकिन इसे सामान्य कर्ज नहीं माना जा सकता है.

चाबहार पोर्ट परियोजना: भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट के विकास में लगभग 500 मिलियन डॉलर निवेश का वादा किया है. इसमें से 150 मिलियन डॉलर एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक ऑफ इंडिया (Exim Bank) के माध्यम से परियोजना के लिए लाइन ऑफ क्रेडिट के तौर पर दिए गए. यह क्रेडिट ईरान की सामान्य सरकारी खाता देनदारी नहीं, बल्कि केवल पोर्ट और रेल लिंक जैसी विशेष परियोजनाओं के लिए था. इस तरह, भारत और ईरान की वित्तीय व्यवस्था नकद कर्ज की बजाय व्यापार और परियोजना निवेश पर आधारित है. यह दोनों देशों के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद है.

क्यों नहीं होता नकद कर्ज?

ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंध और डॉलर की कठिनाई के कारण भारत ने नकद भुगतान नहीं किया. इसकी बजाय रुपये और वस्तु आधारित लेन-देन ने इस समस्या का समाधान किया गया.

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