मिडिल ईस्ट की धरती एक बार फिर बारूद के ढेर पर है और इस बार टकराव की तीव्रता पहले से कहीं अधिक घातक है. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों ने इस क्षेत्र के समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है. इन हमलों में ईरान ने अपने सुप्रीम लीडर और कई शीर्ष सैन्य अधिकारियों को खो दिया है, जो किसी भी देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है. हालांकि, इजरायल और अमेरिका को भी इस युद्ध में जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा है. 

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सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतना कुछ खोने के बाद भी ईरान ने घुटने नहीं टेके हैं और वह आज भी दुश्मन की आंखों में आंखें डालकर मैदान में डटा हुआ है. दुनिया अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या ईरान वाकई अकेला लड़ रहा है या पर्दे के पीछे से उसे कुछ महाशक्तियों का सहारा मिल रहा है?

रूस- ईरान का सबसे मजबूत रणनीतिक ढाल

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ईरान के सबसे करीबी और ताकतवर सहयोगियों में रूस का नाम सबसे ऊपर आता है. पिछले कुछ वर्षों में मास्को और तेहरान के संबंध केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि गहरे रणनीतिक साझेदार के रूप में उभरे हैं. दोनों ही देश वैश्विक राजनीति में अमेरिका के बढ़ते प्रभाव के कट्टर विरोधी हैं. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, और ईरान दशकों से इसी स्थिति में है. ऐसे में दोनों देशों की सोच एक 'बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था' को लेकर एक जैसी है. 

रूस ने अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ी आलोचना की है और इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया है. हालांकि रूस ने सीधे तौर पर युद्ध में अपनी सेना नहीं उतारी है, लेकिन वह ईरान को तकनीकी सहयोग और हथियारों की गुप्त आपूर्ति के जरिए मजबूत बनाए हुए है. रूस का स्पष्ट रुख है कि वह ईरान को गिरने नहीं देना चाहता, क्योंकि ईरान का पतन मध्य पूर्व में रूसी हितों के लिए बड़ा झटका होगा.

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चीन- ईरान की आर्थिक और कूटनीतिक जीवन-रेखा

युद्ध के इस दौर में चीन, ईरान के लिए सबसे बड़ी आर्थिक जीवन-रेखा साबित हो रहा है. चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है. पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना चीन आज भी ईरान से बड़े पैमाने पर सस्ता कच्चा तेल खरीद रहा है, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाया जा सका है. साल 2025 में चीन ने ईरान के तेल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा खरीदा, जो तेहरान के लिए युद्ध लड़ने का फंड मुहैया करा रहा है. 

चीन का मानना है कि अमेरिका की रेजीम चेंज की नीति वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है. इसके अलावा, ईरान चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. चीन संयुक्त राष्ट्र में लगातार ईरान का कूटनीतिक बचाव कर रहा है और कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, वह हथियारों के साथ-साथ रडार और अन्य आधुनिक सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति भी कर रहा है.

पाकिस्तान- पड़ोसी का नैतिक और राजनयिक समर्थन

ईरान के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने भी इस संकट की घड़ी में ईरान को अपना नैतिक समर्थन दिया है. दोनों देश एक लंबी सीमा साझा करते हैं और इस्लामिक पहचान के कारण भी जुड़े हुए हैं. पाकिस्तान ने अमेरिका की सैन्य कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया है. ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत पर पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर शोक व्यक्त किया और संयुक्त राष्ट्र में इन हमलों के खिलाफ आवाज उठाई. हालांकि, पाकिस्तान अपनी आंतरिक आर्थिक स्थिति और अमेरिका के साथ अपने जटिल संबंधों के कारण सीधे तौर पर युद्ध में शामिल नहीं हो सकता, लेकिन उसका राजनयिक और नैतिक समर्थन ईरान को मुस्लिम जगत में एक खास स्थिति प्रदान करता है.

सीरिया- ईरान का पुराना और वफादार साथी

सीरिया और ईरान का गठबंधन दशकों पुराना है. ईरान ने सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान असद सरकार को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी, जिसमें ईरानी मिलिशिया और सलाहकारों ने बड़ी भूमिका निभाई थी. आज जब ईरान संकट में है, तो सीरिया पूरी तरह उसके साथ है. यद्यपि सीरिया खुद आंतरिक अस्थिरता और युद्ध की मार झेल रहा है, इसलिए उसकी सैन्य मदद करने की क्षमता सीमित है, लेकिन वह क्षेत्रीय स्तर पर ईरान को सैन्य समन्वय और अपने क्षेत्र के उपयोग की पूरी आजादी देता है. 

उत्तर कोरिया और बेलारूस

ईरान के परोक्ष समर्थकों में उत्तर कोरिया और बेलारूस का नाम भी तेजी से उभर रहा है. ये दोनों देश अमेरिका के धुर विरोधी खेमे में माने जाते हैं और रूस के बेहद करीब हैं. उत्तर कोरिया के बारे में लंबे समय से खबरें आती रही हैं कि वह ईरान को मिसाइल तकनीक और अन्य सैन्य साजो-सामान की आपूर्ति करता है. मौजूदा युद्ध में भी उत्तर कोरिया की तकनीक ईरान के ड्रोन और मिसाइल कार्यक्रमों को धार दे रही है. वहीं बेलारूस, जो रूस का सबसे वफादार साथी है, राजनीतिक स्तर पर ईरान का समर्थन कर रहा है. ये देश सीधे तौर पर सामने नहीं आ रहे हैं, लेकिन इनका रणनीतिक समीकरण ईरान के पक्ष में झुका हुआ दिखाई देता है.

हिजबुल्लाह

लेबनान का हिजबुल्लाह कोई देश नहीं है, लेकिन इसकी सैन्य शक्ति कई देशों की सेनाओं से अधिक मानी जाती है. हिजबुल्लाह को सालों से ईरान की ओर से पैसा, अत्याधुनिक हथियार और ट्रेनिंग मिलती रही है. इजरायल-ईरान युद्ध में हिजबुल्लाह सबसे सक्रिय भूमिका निभा रहा है. यह संगठन इजरायल की उत्तरी सीमा पर लगातार रॉकेट हमले कर रहा है, जिससे इजरायली सेना को दो मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. 

हूती विद्रोही और शिया मिलिशिया का दबाव

यमन के हूती विद्रोही भी इस युद्ध में ईरान के समर्थन में लाल सागर क्षेत्र में भारी तनाव पैदा किए हुए हैं. हूती लगातार अमेरिकी और इजरायली हितों से जुड़े जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले कर रहे हैं, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित हो रहा है. इसके साथ ही इराक की शिया मिलिशिया भी समय-समय पर अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर क्षेत्रीय दबाव बना रही हैं. ये संगठन सीधे तौर पर ईरान के आदेशों का पालन करते हैं और प्रॉक्सी युद्ध के जरिए अमेरिका और इजरायल की ऊर्जा को अलग-अलग मोर्चों पर बांटने का काम कर रहे हैं.

अमेरिका और इजरायल के समर्थन में खड़ी विश्व शक्तियां

दूसरी ओर, अमेरिका और इजरायल के पक्ष में दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें एकजुट हो गई हैं. ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड और जापान जैसे देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर ईरान की हरकतों की कड़ी निंदा की है. ये देश होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सैन्य और कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं. इन देशों का समर्थन केवल सैन्य नहीं है, बल्कि वे वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए भी काम कर रहे हैं. अमेरिका को इन विकसित देशों का समर्थन प्राप्त है क्योंकि ईरान के साथ तनाव बढ़ने का सीधा असर उनकी अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति पर पड़ता है.

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