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क्या है ग्रीन बूट ऑफ माउंट एवरेस्ट? एक लाश जो सालों से कर रही अपनों का इंतजार

Green Boots On Mount Everest: ग्रीन बूट्स ऑफ माउंट एवरेस्ट पर्वतारोहियों के बीच बहुत मशहूर है. आखिर ये कौन हैं और उनका शव पिछले कई सालों से एवरेस्ट पर क्यों पड़ा है चलिए जानें.

माउंट एवरेस्ट को दुनिया की सबसे ऊंची और खतरनाक चोटी में से एक माना जाता है. 29 मई 1953 को दो लोगों ने दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी को फतेह कर लिया था, जिनका नाम है एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नॉर्गे. इन्हीं दोनों पर्वतारोहियों की सफलता का जश्न मनाने के लिए हर साल 29 मई को इंटरनेशनल एवरेस्ट डे मनाया जाता है. एवरेस्ट की चोटी सफेद बर्फ की चादर में सिमटी जितनी खूबसूरत लगती है, उतने ही राज इसने अपने अंदर समेट रखे हैं. आज हम आपको एक ऐसे ही पर्वतारोही की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसकी लाश को सदियों से अपनों का इंतजार है.

कौन है ग्रीन बूट ऑफ माउंट एवरेस्ट

नेपाली मीडिया की एक रिपोर्ट की मानें तो माउंट एवरेस्ट की चोटी से करीब 200-300 मीटर नीचे की तरफ एक शव करीब 29 साल से पड़ा हुआ है. यह शव शेवांग पलजोर का है. माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पर्वतारोहियों की मानें तो उसे देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कोई थककर सो रहा हो. अगर आप उसके बारे में जानते नहीं हैं तो आप यह बिल्कुल नहीं जान पाएंगे कि वो एक शव है. इस शव की पहचान हरे जूते से की जाती है. यही वजह है कि अब शेवांग का शव ग्रीन बूट्स के नाम से भी जाना जाने लगा है. कोई उनको देखकर डर जाता है तो वहीं कोई उनके साथ फोटो खिंचाता है. 

किसी ने नहीं की थी उनकी मदद

ग्रीन बूट्स के नाम से यह शव आईटीबीपी के जवान और भारतीय पर्वतारोही शेवांग पलजोर का है. ले 10 मई 1996 को अपने दोस्तों का साथ माउंट एवरेस्ट पर जीत हासिल करने के लिए गए थे. दावा है कि उन्होंने माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल कर ली थी और वापस लौट रहे थे कि तभी बर्फ के तूफान में उनकी मौत हो गई. हालांकि उनकी मौत पर आज भी विवाद कायम है. कुछ पर्वतारोहियों का कहना है कि वे बर्फीले तूफान में बच सकते थे, लेकिन किसी ने भी उनकी मदद नहीं की. कहा जाता है कि उन्होंने और उनके साथियों ने मदद की गुहार लगाई थी, लेकिन अन्य पर्वतारोहियों ने जीत की चाहत में मदद करना जरूरी नहीं समझा. तब से लेकर आज तक उनका शव वहीं पर पड़ा हुआ है. 

क्यों कहते हैं डेथ जोन

दरअसल माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई करीब 8848 मीटर के आसपास है. इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम हो जाता है, जिससे दिमाग और फेफड़ों की नसें फटने का खतरा होता है. इस दौरान सबसे ज्यादा मौतें 8000 मीटर के ऊपर वाले हिस्से में होती हैं, इसलिए इसे डेथ जोन भी कहते हैं. रिपोर्ट्स की मानें तो 2019 तक चढ़ाई के दौरान करीब 308 पर्वतारोहियों की मौत हो गई थी. दरअसल इतनी ऊंचाई से शव लाना बहुत मुश्किल काम है और इसीलिए पर्वतारोही साथियों के शव वहीं छोड़ आते हैं. यहां पर तापमान -16 से - 40 डिग्री तक रहता है, जो कि डीप फ्रीजर का काम करती है और इसीलिए शव सड़ते नहीं है. 

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