एक्सप्लोरर

इंदिरा, जेपी से लेकर चंद्रशेखर तक...किसकी जनसभाओं में उमड़ती थी सबसे ज्यादा भीड़? जानें आंदोलनों का इतिहास

देश के राजनीतिक इतिहास में रैलियों और आंदोलनों का बहुत बड़ा महत्व रहा है. जंतर-मंतर पर हालिया कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बीच इतिहास खंगालें तो इंदिरा गांधी, जेपी और चंद्रशेखर की जनसभाओं में रिकॉर्ड भीड़ जुटती थी.

Show Quick Read
Key points generated by AI, verified by newsroom
  • लालू, कांशीराम ने सामाजिक चेतना के आंदोलनों को उभारा.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का बड़ा प्रदर्शन देखने को मिला. पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके की अगुवाई में युवाओं की भारी भीड़ सड़कों पर उतरी, जिसने एक बार फिर देश में जन आंदोलनों की ताकत को याद दिला दिया है. भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में कोई बड़ा मुद्दा उठा है, तब-तब जनता ने मैदानों को पाट दिया है. भारत में इंदिरा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण और चंद्रशेखर जैसे दिग्गजों की रैलियों में ऐसा जनसैलाब उमड़ता था, जो सत्ता की दिशा बदल देता था. चलिए ऐतिहासिक आंदोलनों के बारे में जानें. 

इंदिरा गांधी का जादुई और अनूठा करिश्मा

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने दौर की सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय जननेता मानी जाती थीं. आपातकाल लागू होने से पहले के दौर में उनकी जनसभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर विरोधी दल भी दंग रह जाते थे. इंदिरा गांधी की चुनावी रैलियों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उनमें महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती थी. लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए मीलों पैदल चलकर आते थे. वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा से ठीक पहले दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में हुई उनकी रैली को आज भी देश की सबसे विशाल रैलियों में गिना जाता है.

जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का आह्वान

वर्ष 1974-75 के दौरान जब देश में व्यवस्था परिवर्तन की लहर चली, तो जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में इतिहास का सबसे बड़ा जनआंदोलन खड़ा हुआ. जेपी की 'संपूर्ण क्रांति' (Total Revolution) के आह्वान पर देश के कोने-कोने से लाखों युवा और आम नागरिक सड़कों पर उतर आए थे. पटना के गांधी मैदान से लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान तक, जेपी की रैलियों में जुटने वाली भीड़ का कोई मुकाबला नहीं था. उस दौर में ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ के नारों के साथ जुटने वाले जनसैलाब ने तत्कालीन केंद्र सरकार की नींव को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया था.

युवा तुर्क चंद्रशेखर की ऐतिहासिक पदयात्रा

'युवा तुर्क' के नाम से मशहूर और बाद में देश के प्रधानमंत्री पद की कमान संभालने वाले चंद्रशेखर की जनसभाओं का मिजाज भी बिल्कुल अलग होता था. वे सीधे जनता से जुड़ने वाले नेता थे और उनकी रैलियों में आम जनता का गहरा जुड़ाव दिखता था. देश के लोगों की वास्तविक समस्याओं और उनकी नब्ज को करीब से जानने के लिए उन्होंने कन्याकुमारी से लेकर दिल्ली के राजघाट तक एक ऐतिहासिक 'पदयात्रा' की थी. इस लंबी पदयात्रा के दौरान देश के जिस भी हिस्से से चंद्रशेखर गुजरते थे, वहां उनके स्वागत और समर्थन में लाखों लोगों का हुजूम सड़कों पर उमड़ पड़ता था.

यह भी पढ़ें: कॉकरोच जनता पार्टी कैसे बन सकती है पॉलिटिकल पार्टी, जानें चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन का क्या होता है प्रॉसेस

अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों का जादू

भारतीय राजनीति के इतिहास में वर्ष 1970 से लेकर 2000 के दशक तक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की रैलियों का एक अलग ही क्रेज था. अटल जी देश के एक ऐसे प्रखर वक्ता थे, जिनकी भाषा की सादगी और ओजस्वी भाषण शैली का हर कोई कायल था. जनसंघ के जमाने से लेकर भाजपा के उभार तक, देश के किसी भी हिस्से में होने वाली उनकी रैलियों में अपार जनसमूह उमड़ता था. दिल्ली के रामलीला मैदान में उनके भाषणों को सुनने के लिए लोग चिलचिलाती धूप और विपरीत मौसम में भी घंटों पहले आकर अपनी जगह पक्की कर लेते थे.

राजीव गांधी का युवाओं के बीच जबरदस्त क्रेज

वर्ष 1980 के दशक में देश की कमान संभालने वाले राजीव गांधी ने भारतीय राजनीति में युवाओं को एक नई दिशा दी थी. अपनी बेदाग छवि और आधुनिक सोच के कारण वे देश के युवाओं के बीच अत्यधिक लोकप्रिय चेहरा बनकर उभरे थे. देश भर में होने वाली उनकी चुनावी सभाओं में रिकॉर्ड तोड़ भीड़ जुटती थी, जिसमें युवाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा देखी जाती थी. राजीव गांधी की रैलियों में दिखने वाला भारी जनसमर्थन इस बात का सबूत था कि देश की नई पीढ़ी उनके साथ कितनी मजबूती से खड़ी थी और उनके विचारों से प्रभावित थी.

लालू प्रसाद यादव की ठेठ और देसी शैली

वर्ष 1990 के दशक में बिहार की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय पटल पर छाने वाले लालू प्रसाद यादव की रैलियों का अपना एक अलग ही अंदाज होता था. अपनी विशिष्ट और ठेठ भाषण शैली के दम पर वे ग्रामीण, गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगों को सीधे अपने साथ जोड़ लेते थे. सामाजिक न्याय के नारों के दम पर उन्होंने राजनीति में एक नया समीकरण तैयार किया था. पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान लालू प्रसाद यादव की ऐसी दर्जनों महारैलियों का गवाह रहा है, जहां पैर रखने तक की जगह नहीं बचती थी और लोग पेड़ों पर चढ़कर उन्हें सुनते थे.

कांशीराम का बहुजन चेतना का महाअभियान

वर्ष 1980 और 1990 के दशक में कांशीराम ने देश के दलितों, शोषितों और बहुजन समाज के भीतर एक नई राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया था. उनके इस सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का असर यह हुआ कि उनकी छोटी से छोटी जनसभाओं में भी भारी संख्या में लोग अनुशासित तरीके से एकत्रित होते थे. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के विशाल मैदानों में कांशीराम की रैलियों के दौरान जो जनसैलाब उमड़ता था, उसने देश के बड़े-बड़े सियासी पंडितों को हैरान कर दिया था. इस भीड़ ने आगे चलकर देश की सत्ता का संतुलन हमेशा के लिए बदल दिया.

लालकृष्ण आडवाणी की ऐतिहासिक रथ यात्रा

वर्ष 1990 का दौर भारतीय राजनीति में एक और बड़े बदलाव का गवाह बना, जब लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी प्रसिद्ध राम रथ यात्रा की शुरुआत की थी. इस यात्रा के दौरान पूरे देश के भीतर एक अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ पड़ा था. आडवाणी का रथ जिस भी शहर, कस्बे या गांव से होकर गुजरता था, वहां लाखों की संख्या में लोग उनके स्वागत में सड़कों के दोनों तरफ कतारें लगाकर खड़े रहते थे. इस यात्रा और इसके दौरान जुटने वाली भीड़ ने भारतीय जनता पार्टी को देश की सियासत के शीर्ष पर पहुंचाने में सबसे मुख्य भूमिका निभाई थी.

भीड़ का पैमाना और बदलते सियासी मायने

अगर इतिहास के इन सभी दिग्गज नेताओं की रैलियों की आपस में तुलना की जाए, तो किसी एक के पक्ष में सटीक आंकड़ा देना मुमकिन नहीं है. असल में हर नेता की रैली में जुटने वाली भीड़ के पीछे उस समय की परिस्थितियां और मुद्दे सबसे बड़े कारक होते थे. इंदिरा जी के पास सत्ता का जादुई आकर्षण था, तो जेपी के पास भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजा जन-आक्रोश था. वहीं अटल जी के पास शब्दों का जादू था, तो लालू और कांशीराम के पास सामाजिक बदलाव की ताकत थी. इन सभी आंदोलनों और रैलियों ने साबित किया कि भारतीय लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी ताकत है.

यह भी पढ़ें: कॉकरोच जनता पार्टी को अब तक किस-किस ने दिया सपोर्ट, यहां देख लें पूरी लिस्ट

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

Read More
और पढ़ें
Sponsored Links by Taboola
Advertisement

टॉप हेडलाइंस

लंदन की सड़कों पर लगी रेलिंग का क्या है द्वितीय विश्व युद्ध से संबंध, जानें यहां?
लंदन की सड़कों पर लगी रेलिंग का क्या है द्वितीय विश्व युद्ध से संबंध, जानें यहां?
किस कार का इस्तेमाल करती हैं ममता बनर्जी? ये कितनी सुरक्षित
किस कार का इस्तेमाल करती हैं ममता बनर्जी? ये कितनी सुरक्षित
बिना इजाजत किसी का बना लिया वीडियो, इस पर कितनी हो सकती है सजा?
बिना इजाजत किसी का बना लिया वीडियो, इस पर कितनी हो सकती है सजा?
किन राज्यों में बाहरी नहीं खरीद सकते जमीन, क्यों लिया गया ऐसा फैसला?
किन राज्यों में बाहरी नहीं खरीद सकते जमीन, क्यों लिया गया ऐसा फैसला?
Advertisement

वीडियोज

Bareilly Ke Bacchan: 😯Sangam की बल्लेबाज़ी और ससुर की गेंदबाजी, पहली गेंद पर टूटा बैट छूटी हंसी #sbs
Govinda संग Komal Rani Swarnkar हुईं स्पॉट, 4 साल की Dating Rumours फिर चर्चा में
Bhojpuri Bawal में Kajal Raghwani पर भड़के Nirahua, बोले- ‘आप उसी के लायक हो’
Pati Brahmachari: 😯Suraj का फिर दिखा पुराना 'राउडी' अवतार, Isha संग मिलकर मिशन पर निकला हीरो #sbs
Bollywood News: भारतीय फैंस से 2 दिन पहले विदेशी दर्शक देखेंगे 'रामायण', जानें मेकर्स की इस खास रिलीज स्ट्रेटजी के पीछे की वजह (08.08.26)
Advertisement

फोटो गैलरी

Advertisement

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
सरकार ने ED डायरेक्टर राहुल नवीन का बढ़ाया कार्यकाल
सरकार ने ED डायरेक्टर राहुल नवीन का बढ़ाया कार्यकाल
यूपी चुनाव में करणी सेना की एंट्री, इतनी सीटों पर उतारेगी प्रत्याशी
यूपी चुनाव में करणी सेना की एंट्री, इतनी सीटों पर उतारेगी प्रत्याशी
'अलग खेल चल रहा है...', वायरल मीम्स पर बोले रवि किशन, पॉपुलैरिटी का जेन जी को दिया क्रेडिट
'अलग खेल चल रहा है...', वायरल मीम्स पर बोले रवि किशन, पॉपुलैरिटी का जेन जी को दिया क्रेडिट
ब्रेट ली ने वैभव सूर्यवंशी की उम्र पर दिया अजीब बयान, ऐसा किसी ने भी नहीं कहा
ब्रेट ली ने वैभव सूर्यवंशी की उम्र पर दिया अजीब बयान, ऐसा किसी ने भी नहीं कहा
थरूर के बयान पर आया कांग्रेस नेता वेणुगोपाल का रिएक्शन, बोले- 'ध्यान रखना चाहिए कि...'
थरूर के बयान पर आया कांग्रेस नेता वेणुगोपाल का रिएक्शन, बोले- 'ध्यान रखना चाहिए कि...'
Monsoon Travel Insurance: घूमने से पहले करा लें Monsoon Travel Insurance, इसमें क्या-क्या कवर?
घूमने से पहले करा लें Monsoon Travel Insurance, इसमें क्या-क्या कवर?
वायरलेस चार्जिंग में बार-बार हो रही दिक्कत? कहीं फोन कवर तो नहीं है कारण
वायरलेस चार्जिंग में बार-बार हो रही दिक्कत? कहीं फोन कवर तो नहीं है कारण
50 हजार की डाउन पेमेंट पर Fronx खरीदें तो कितनी बनेगी EMI? जानें हिसाब
50 हजार की डाउन पेमेंट पर Fronx खरीदें तो कितनी बनेगी EMI? जानें हिसाब
Embed widget