सोमवार को भारतीय करेंसी ने इतिहास में पहली बार अमेरिकी डॉलर के सामने 95 का आंकड़ा पार कर लिया. मौजूदा वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान रुपये की वैल्यू में अब तक 9.88 फीसदी की भारी कमी दर्ज की गई है. पिछले 14 वर्षों के अंतराल में यह रुपये के अवमूल्यन की सबसे डरावनी और बड़ी गिरावट मानी जा रही है. अक्सर जब हम अखबारों में ऐसी खबरें पढ़ते हैं तो हमें लगता है कि हमारा रुपया बहुत कमजोर है, लेकिन अर्थशास्त्र की एक बहुत पुरानी और सटीक थ्योरी है, जो इस धारणा को पूरी तरह बदल देती है. इसे परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) यानी क्रय शक्ति समता कहते हैं. अगर आप इस सिद्धांत को समझ लेंगे, तो आपको समझ आएगा कि भारतीय रुपया उतना कमजोर नहीं है, जितना वह अंतरराष्ट्रीय बाजार के आंकड़ों में दिखता है. वास्तव में, भारत की असली आर्थिक ताकत इसी थ्योरी के पीछे छिपी है.
क्या है क्रय शक्ति समता का असली मतलब?
क्रय शक्ति समता (PPP) एक ऐसा आर्थिक पैमाना है, जो दो अलग-अलग देशों की मुद्राओं के बीच तुलना उनकी बाजार दर (Exchange Rate) से नहीं, बल्कि उनकी खरीदने की क्षमता से करता है। सरल शब्दों में कहें तो, 1 डॉलर में अमेरिका में आप जितना सामान खरीद सकते हैं, उतना ही सामान भारत में कितने रुपये में आएगा? अगर अमेरिका में एक बर्गर 1 डॉलर का मिलता है और वही बर्गर भारत में 25 रुपये में मिल जाता है, तो PPP के हिसाब से 1 डॉलर की कीमत 25 रुपये होनी चाहिए, भले ही बैंक की स्क्रीन पर वह 84 रुपये दिख रही हो.
गुस्ताव कैसल की वो थ्योरी जिसने बदला नजरिया
इस क्रांतिकारी सिद्धांत की नींव साल 1918 में स्वीडिश अर्थशास्त्री गुस्ताव कैसल ने रखी थी. उन्होंने दुनिया को बताया कि मुद्राओं की असली कीमत सिर्फ शेयर बाजार या विदेशी व्यापार से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि उस मुद्रा से आम इंसान की बुनियादी जरूरतें कितनी पूरी हो रही हैं. कैसल की यह थ्योरी आज भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसे संस्थानों के लिए किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का असली आकार मापने का सबसे भरोसेमंद तरीका मानी जाती है.
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बाजार दर बनाम वास्तविक क्रय शक्ति
आमतौर पर हम जिस विनिमय दर (Exchange Rate) को देखते हैं, उसे मार्केट रेट कहा जाता है. यह दर मांग और आपूर्ति के आधार पर हर सेकंड बदलती रहती है, लेकिन यह दर यह नहीं बताती कि भारत में रहने वाले एक आम नागरिक का जीवन स्तर कैसा है. PPP के अनुसार, अगर आप भारत में 20-25 रुपये में वो चीजें हासिल कर लेते हैं जो अमेरिका में 1 डॉलर खर्च करके मिलती हैं, तो भारतीय रुपये की ताकत मार्केट रेट से कहीं ज्यादा है. यही वजह है कि भारत में सेवाओं और वस्तुओं की कीमतें विकसित देशों के मुकाबले बहुत कम हैं.
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत
जब हम जीडीपी की तुलना नॉमिनल यानी बाजार दर पर करते हैं, तो भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था दिखता है, लेकिन जैसे ही हम PPP का चश्मा लगाते हैं तो भारत छलांग लगाकर सीधे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाता है. इसका कारण यह है कि भारत में श्रम, अनाज और सेवाएं सस्ती हैं. यहां एक रुपये की क्रय शक्ति बहुत अधिक है, जिससे कम पैसे में भी लोग बेहतर जीवन जी पाते हैं. यही वह सच है जो डॉलर के प्रभुत्व को कड़ी टक्कर देता है.
ऐसे समझें रुपये में कितना है दम
इसे एक मोबाइल फोन या किसी गैजेट के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है. मान लीजिए कि एक स्मार्टफोन की कीमत अमेरिका में 500 डॉलर है. अगर वही स्मार्टफोन भारत में सभी टैक्स हटाकर 40,000 रुपये में उपलब्ध है, तो इस विशिष्ट वस्तु के लिए PPP विनिमय दर 1 डॉलर = 80 रपये होगी. लेकिन अगर भारत में वही सेवाएं (जैसे बाल कटवाना या टैक्सी का किराया) बहुत कम दाम में उपलब्ध हैं, तो पूरे देश का औसत PPP रेट काफी नीचे आ जाता है. इससे पता चलता है कि रुपये की आंतरिक मजबूती बहुत अधिक है.
जीवन यापन की लागत और गरीबी का पैमाना
PPP थ्योरी का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह लिविंग ऑफ कॉस्ट यानी जीवन यापन की लागत को सही तरीके से दर्शाती है. विकासशील देशों में गरीबी का स्तर मापने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थान इसी का उपयोग करते हैं. भारत जैसे देश में, जहां सेवाओं की लागत कम है, वहां कम आय वाला व्यक्ति भी अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकता है, जबकि उतनी ही नॉमिनल आय में अमेरिका या यूरोप के किसी शहर में गुजारा करना नामुमकिन होगा. यह रुपये की छिपी हुई ताकत ही है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता देती है.
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