Indian Railways: भारतीय रेलवे एक बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है. इसका मकसद सफर को तेज, सुरक्षित और ज्यादा आरामदायक बनाना है. रेल मंत्रालय की एक नई प्रोडक्शन योजना के तहत 2026-27 में लगभग 492 पैसेंजर लोकोमोटिव बनाए जाने हैं. इसमें ज्यादातर WAP-7 जैसे एडवांस्ड सातवीं पीढ़ी के इंजन और नई पीढ़ी की अमृत भारत एक्सप्रेस कैटेगरी के इंजन शामिल होंगे. इसी बीच आइए जानते हैं कि देश में ट्रेनों की शुरुआत कैसे हुई और पहली पीढ़ी से अब तक वह कितनी आगे निकल चुकी हैं.
कैसे थे पहली ट्रेनों के इंजन?
भारत की रेल यात्रा की शुरुआत 1853 में साहिब, सिंध और सुल्तान जैसे भाप से चलने वाले इंजन के साथ हुई थी. ये इंजन कोयले और पानी से चलते थे. इनमें से भारी धुआं निकलता था और वे काफी धीमी रफ्तार से चलते थे. सफर काफी ज्यादा साधारण और शोर-शराबे वाला होता था और इसमें आराम तो बिल्कुल भी नहीं था.
कैसे हैं आधुनिक इंजन?
आज के 7वीं पीढ़ी के लोकोमोटिव काफी ज्यादा अलग तरह के हैं. यह पूरी तरह से बिजली से चलते हैं और काफी ज्यादा ताकत देते हैं. WAP-7 जैसे इंजन 6000 हॉर्सपावर से ज्यादा की ताकत देते हैं. ये 130 से 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकते हैं.
कैसे थे तब के कोच?
शुरुआती रेल कोच पूरी तरह से लकड़ी के बने होते थे. इनके दरवाजे बाहर की तरफ खुलते थे और इनमें लगभग कोई भी सुविधा नहीं होती थी. 1905 के पहले पंखे जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं होती थीं. सफर की स्थिति काफी मुश्किल होती थी.
अब के कोच
आज के आधुनिक कोच जैसे LHB और अमृत भारत वेरिएंट स्टेनलेस स्टील से बने होते हैं. इनमें सुरक्षा के लिए एडवांस्ड सिस्टम लगे होते हैं. इन कोच को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि दुर्घटना के समय यह एक दूसरे के अंदर ना घुसें. साथ ही इनमें बेहतर लाइटिंग, ज्यादा आरामदायक सीट और आधुनिक टॉयलेट सिस्टम जैसी सुविधाएं हैं. पुराने जमाने में ट्रेनों में ठंडक के लिए बर्फ के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब एयर कंडीशनिंग, वैक्यूम टॉयलेट और 'कवच' जैसे स्मार्ट सुरक्षा सिस्टम होते हैं.
भारतीय रेलवे अब हाइड्रोजन से चलने वाले कोच और WAP-7D जैसे एयरोडायनामिक लोकोमोटिव डिजाइनों के साथ प्रयोग कर रहा है. इन इनोवेशन का उद्देश्य ईंधन पर निर्भरता को कम करना, उत्सर्जन में कटौती करना और रफ्तार व एफिशिएंसी को और बढ़ाना है.
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