Jalebi Origin: अगर आपको ऐसा लगता है कि भारत की सबसे मशहूर मिठाई जलेबी पूरी तरह से यहीं की देन है तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. जलेबी को अक्सर भारत की राष्ट्रीय मिठाई कहा जाता है. लेकिन यह असल में ईरान से आई है. यह फारसी मिठाई भारत की सबसे पसंदीदा मिठाइयों में से एक बन चुकी है. आइए जानते हैं कैसा रहा इसका सीमा पार का सफर.

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जुलबिया से जलेबी तक का सफर 

सदियों पहले फारस में जुलबिया नाम की एक मिठाई काफी पसंद की जाती थी. यह मिठाई लगभग 500 साल पहले भारत पहुंची. इसे मध्यकाल के दौरान तुर्की और ईरानी व्यापारी अपने साथ लाए थे. अपने मूल रूप में जुलबिया को शहद और गुलाब जल की चाशनी में डुबाया जाता था. जब यह भारत पहुंची तो इसमें यहां के स्थानीय स्वाद घुल गए. चीनी की चाशनी, केसर और इलायची ने मूल सामग्री की जगह ले ली. इस तरह उस मिठाई का जन्म हुआ जिसे आज हम जलेबी के नाम से जानते हैं.

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प्राचीन जिक्र और साहित्यिक जड़ें

जलेबी का इतिहास भारत में इसके आने से भी कहीं ज्यादा पुराना है. इसका सबसे पहले जिक्र दसवीं सदी की अरबी पाक कला की किताब 'किताब-अल-तबीख' में मिलता है. इसे मुहम्मद बिन हसन अल बगदादी ने लिखा था. इस किताब में इस मिठाई को जुलबिया कहा गया है.

भारत में इसका सबसे पहला लिखित जिक्र 1450 ईस्वी के एक जैन ग्रंथ 'प्रियमकर्णृपकथा' में मिलता है. यहां इसे एक भव्य दावत में परोसा गया था.

भारत में इसे अपना कैसे बनाया? 

हालांकि इसकी शुरुआत फारस में हुई थी लेकिन भारत ने जलेबी को एक अनोखी पहचान दी. घोल को खमीर उठाने, उसे घुमावदार आकार में तलने और फिर चीनी की चाशनी में डुबोने की विधि ने इसे बाहर से कुरकुरा और अंदर से रसीला बना दिया. समय के साथ यह त्योहार, शादी और यहां तक की रोजमर्रा के नाश्ते में भी एक बड़ा हिस्सा बन गई.

जलेबी के अलग-अलग रूप 

पूरे भारत में हर क्षेत्र में इसके अलग-अलग रूप हैं. इंदौर में आपको विशाल जलेबा मिलेगा. यह जलेबी का ही एक ज्यादा भारी और मोटा रूप है. उत्तरी भारत में आपको इमरती मिलती है. इसका डिजाइन ज्यादा बारीक होता है और इसे उड़द की दाल के घोल से बनाया जाता है. पश्चिम बंगाल और उड़ीसा जैसे पूर्वी राज्यों में छेना जिलिपी मिलती है. यह काफी ज्यादा नरम होती है और इसे पनीर से बनाया जाता है.

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