देश में रोज हजारों ट्रेनें सिग्नल के हिसाब से दौड़ती हैं. हरा हुआ तो चल पड़ीं, लाल हुआ तो रुक गईं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसी भी ट्रेन है जो सिग्नल से नहीं, बल्कि लोगों के हाथ के इशारे से चलती है? यह ट्रेन न किसी बड़े शहर में है, न हाईस्पीड है, फिर भी 100 साल से ज्यादा समय से चल रही है. इसकी कहानी भारतीय रेलवे के इतिहास का एक अनोखा अध्याय है.

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हाथ के इशारे पर रुकने वाली अनोखी ट्रेन

भारतीय रेलवे दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेल सेवा मानी जाती है. हर दिन करीब 13 हजार यात्री ट्रेनें देश के अलग-अलग हिस्सों में सफर करती हैं. आमतौर पर हर ट्रेन सिग्नल सिस्टम के तहत चलती है, लेकिन उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में एक ऐसी छोटी ट्रेन है, जो इस नियम से अलग अपनी खास पहचान बनाए हुए है.

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यह ट्रेन जालौन जिले के एट जंक्शन से कोंच के बीच चलती है. करीब 13 किलोमीटर लंबे इस रूट पर यह एक छोटी शटल सेवा है, जिसे स्थानीय लोग प्यार से अड्डा कहकर बुलाते हैं.

1902 से जारी है सफर

इस ट्रेन की शुरुआत अंग्रेजों के समय में, साल 1902 में हुई थी. यानी यह सेवा 124 साल से ज्यादा समय से चल रही है. इतने लंबे समय में रेलवे ने कई बदलाव देखे, लेकिन इस छोटी लाइन की पहचान आज भी वैसी ही है. इसका रूट छोटा जरूर है, लेकिन इसका महत्व कम नहीं है. बुंदेलखंड जैसे इलाके में, जहां गांव दूर-दूर बसे हैं, यह ट्रेन रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है. 

सिग्नल नहीं, हाथ का इशारा

इस ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसे रोकने के लिए यात्रियों को बस हाथ दिखाना होता है. अगर कोई व्यक्ति ट्रैक के पास या प्लेटफॉर्म पर खड़ा होकर इशारा करता है, तो ट्रेन रुक जाती है. हालांकि यह पूरी तरह अनियंत्रित नहीं है. ट्रेन एक तय रूट और सीमित स्टेशनों के बीच चलती है, लेकिन स्थानीय जरूरतों के मुताबिक रुकने की लचीलापन इसकी पहचान बन चुका है. 

छोटी ट्रेन, बड़ा सहारा

इस ट्रेन में सिर्फ तीन डिब्बे हैं. इसकी औसत रफ्तार करीब 30 किलोमीटर प्रति घंटा है. 13 किलोमीटर का सफर यह लगभग 40 मिनट में पूरा करती है. यहां के किसान अपनी उपज लेकर इसी ट्रेन से बाजार पहुंचते हैं. छोटे व्यापारी और विद्यार्थी भी इसी पर निर्भर रहते हैं. इसीलिए यह ट्रेन सिर्फ एक परिवहन साधन नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की जीवनरेखा है.

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