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ईरान-US की तरह भारत भी समंदर में कर चुका नाकेबंदी, पढ़ें इस मुल्क की हार की 50 साल पुरानी कहानी

समंदर की नाकेबंदी किसी भी सैन्य अभियान का सबसे निर्णायक हिस्सा हो सकती है, ईरान और अमेरिका यही कर रहे हैं. लेकिन क्या आपको पता है आज से करीब 50 साल पहले भारत ने भी ऐसी ही नाकेबंदी की थी, चलिए जानें.

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  • 1971 युद्ध में भारतीय नौसेना ने बंगाल की खाड़ी में घेराबंदी की.
  • INS विक्रांत ने पूर्वी पाकिस्तान की आपूर्ति मार्ग पूरी तरह बंद कर दिए.
  • नौसैनिक घेराबंदी से पाकिस्तानी सेना की रसद और सैन्य मदद रुकी.
  • इस निर्णायक घेराबंदी से 93,000 सैनिकों का आत्मसमर्पण हुआ.

समुद्री नाकेबंदी का खेल आज भले ही ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का केंद्र बना हुआ है, लेकिन 50 साल पहले भारत ने एक ऐसी समुद्री घेराबंदी की थी, जिसने न केवल इतिहास की धारा मोड़ी, बल्कि दुनिया के नक्शे पर एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का उदय सुनिश्चित किया. 1971 के युद्ध में भारतीय नौसेना की वह रणनीतिक चाल एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसने साबित किया कि समंदर की खामोश घेराबंदी जमीन पर बड़ी-बड़ी तोपों से कहीं ज्यादा असरदार साबित हो सकती है.

मिथक तोड़ने वाली नौसेना की रणनीति

1960 के दशक तक भारतीय सैन्य गलियारों में यह धारणा आम थी कि युद्ध के परिणाम केवल थल सेना या वायुसेना के दम पर तय होते हैं. नौसेना को अक्सर एक सहायक भूमिका में देखा जाता था. लेकिन पूर्व नौसेना प्रमुख एस.एम. नंदा ने अपनी किताब 'द मैन हू बॉम्ब्ड कराची' में इस मिथक के ढहने की कहानी बयां की है. 1971 के युद्ध के दौरान, जब भारत ने समुद्री सीमाओं पर अपनी कमान संभाली, तो उसने न केवल रक्षात्मक रुख अपनाया बल्कि एक ऐसी आक्रामक रणनीति अपनाई, जिसने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी.

बंगाल की खाड़ी में बुना गया मौत का जाल

युद्ध शुरू होने से बहुत पहले ही भारतीय नौसेना ने बंगाल की खाड़ी में एक अदृश्य जाल बुनना शुरू कर दिया था. भौगोलिक रूप से पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच की दूरी ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी. जब भारत ने पाकिस्तान के लिए अपना एयरस्पेस बंद किया, तो समुद्री मार्ग ही एकमात्र जीवनरेखा बचा था. भारतीय नौसेना ने बंगाल की खाड़ी में INS विक्रांत को तैनात कर उसे एक अभेद्य किले में बदल दिया. चटगांव और अन्य बंदरगाहों पर कड़ी निगरानी ने यह सुनिश्चित कर दिया कि पाकिस्तान का कोई भी जहाज न तो पूर्वी मोर्चे तक पहुंच सके और न ही वहां से निकल सके.

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रसद और सैन्य मदद पर लगा ताला

पाकिस्तान की पूर्वी कमान पूरी तरह से समुद्री आपूर्ति पर निर्भर थी. भारतीय नौसेना की घेराबंदी ने उन्हें पूरी तरह अलग-थलग कर दिया. न तो हथियारों की नई खेप उन तक पहुंच पा रही थी और न ही खाने-पीने का राशन. समुद्री रास्ते बंद होने के कारण वहां मौजूद पाकिस्तानी सेना रसद के बिना तिल-तिल कर मरने को मजबूर थी. इधर, मुक्ति वाहिनी के लड़ाके जमीन पर पाकिस्तानी फौज को छका रहे थे, तो उधर नौसेना के माइंस और गश्त ने समुद्री भागने के रास्ते भी बंद कर दिए थे.

ऑपरेशन विध्वंस का कूटनीतिक असर

एस.एम. नंदा के सख्त निर्देश थे कि पाकिस्तान के संचार मार्गों को जड़ से मिटा दिया जाए. INS विक्रांत के सी हॉक विमानों ने चटगांव, कॉक्स बाजार, खुलना और मोंगला के बंदरगाहों पर जो हवाई हमले किए, वे बेमिसाल थे. ईंधन डिपो से लेकर लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर तक, सब कुछ मलबे में तब्दील हो गया. भारत ने कभी औपचारिक रूप से नाकेबंदी की घोषणा नहीं की थी, लेकिन हकीकत में समंदर पूरी तरह भारत के नियंत्रण में था. पाकिस्तानी सेना पूरी तरह पंगु हो चुकी थी और उसके पास हार मानने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था.

93 हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण

यह नौसैनिक घेराबंदी भारतीय थल सेना और वायुसेना के लिए एक कैटेलिस्ट का काम कर रही थी. जमीनी अभियान और समुद्री घेराबंदी के बीच पाकिस्तानी फौज इस कदर घिर गई कि उसका ढाका से संपर्क कट गया. आखिरकार 16 दिसंबर 1971 का वह ऐतिहासिक दिन आया, जब पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाजी को 93,000 सैनिकों के साथ भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी के सामने घुटने टेकने पड़े. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था, जिसने इतिहास की किताबों में बांग्लादेश के जन्म को अमर कर दिया.

आज के दौर में उस सबक की अहमियत

ईरान और अमेरिका आज जिस होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कूटनीतिक रस्साकशी कर रहे हैं, वह हमें 1971 के उसी समुद्री सबक की याद दिलाता है. समंदर की नाकेबंदी केवल जहाजों को रोकने का काम नहीं है, यह एक देश की जीवनरेखा को काट देने का कूटनीतिक हथियार है. भारत ने 50 साल पहले बिना किसी औपचारिक युद्ध घोषणा के जो मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक बढ़त हासिल की थी, वह आज भी दुनिया भर की सैन्य अकादमियों में एक केस स्टडी की तरह पढ़ाई जाती है. यह साबित करता है कि समंदर पर जिसकी पकड़ होगी, जीत उसी की होगी.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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