Britain Owed India: कुछ दिन पहले ही 15 अगस्त को देश के हर कोने में आजादी के नारे गूंज रहे थे, देश के हर कोने में इस साल 80वें स्वतंत्रता दिवस जोर-शोर से मनाया गया. जहां भारत के पास आज इतनी संपत्ति है वहीं क्या आपने कभी सोचा है कि जब भारत को 15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों से आजादी मिली थी जब वे देश छोड़कर गए थे तब सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि आखिर सैकड़ों साल तक भारत पर राज करने वाले अंग्रेज जाते-जाते देश को आर्थिक तौर पर कितना पैसा और विरासत सौंप गए थे. इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें उस दौर की "स्टर्लिंग बैलेंस" यानी उस रकम को समझना होगा, जो अंग्रेजी सरकार पर भारत का बकाया था. आइए जानते हैं इस बारे में पूरी जानकारी.
क्या होता था स्टर्लिंग बैलेंस और कितनी थी रकम?
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने अपनी सेना, हथियार और युद्ध से जुड़े जरूरी सामान के लिए भारत से भारी मात्रा में कर्ज और सामान लिया था. इसके बदले में ब्रिटेन को भारत को पैसा चुकाना था, जिसे उस समय "स्टर्लिंग बैलेंस" कहा जाता था.
रिपोर्टों के मुताबिक आजादी के समय ब्रिटेन पर भारत का बकाया करीब 1300 मिलियन पाउंड वो रकम आज के पाउंड में करीब 66 अरब पाउंड बैठती है, और भारतीय रुपये में बदलें तो यह आंकड़ा करीब 8.5 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंचता है, जो उस दौर के हिसाब से काफी बड़ी रकम मानी जाती थी. हालांकि इस रकम को लेकर भारत और ब्रिटेन के बीच लंबी बातचीत चली, क्योंकि ब्रिटेन उस समय खुद युद्ध की वजह से आर्थिक तंगी से जूझ रहा था और पूरी रकम एक साथ चुकाने की स्थिति में नहीं था.
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भारत और ब्रिटेन के बीच कैसे हुआ समझौता?
इस बकाया रकम को लेकर भारत और ब्रिटेन सरकार के बीच कई दौर की बातचीत हुई, जिसमें यह तय हुआ कि ब्रिटेन इस रकम को एक साथ नहीं बल्कि धीरे-धीरे किश्तों में चुकाएगा. बातचीत के दौरान यह भी सामने आया कि भारत को इस रकम में से एक हिस्सा रक्षा से जुड़े सामान और संपत्तियों के एवज में ब्रिटेन को वापस भी देना पड़ा. उस दौर में 1 ब्रिटिश पाउंड की कीमत करीब 13 भारतीय रुपये के बराबर मानी जाती थी. इस हिसाब से यह रकम भारतीय मुद्रा में हजारों करोड़ रुपये के बराबर बैठती थी.
कई इतिहासकारों का मानना है कि भारत को इस बकाया रकम का पूरा हिस्सा कभी नहीं मिल पाया, क्योंकि बाद के सालों में हुए समझौतों में यह रकम धीरे-धीरे कम होती गई. हालांकि यह रकम भले ही आज के आंकड़ों के हिसाब से छोटी लग सकती है, लेकिन उस दौर में यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा सहारा साबित हो सकती थी, क्योंकि देश उस समय भुखमरी, गरीबी और बंटवारे जैसी कई बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा था.
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