Party Merger: तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस पार्टी के बीच संभावित विलय को लेकर अटकलें अब और भी तेज हो गई हैं. ये अटकलें तब तेज हो गईं जब हाल ही में दोनों पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं के बीच बैठकें हुई. तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से मुलाकात और तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी की विपक्ष नेता राहुल गांधी से बातचीत के बाद राजनीतिक चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया.  इस घटना के बीच लोगों के मन में एक सवाल उठ रहा है कि भारत में राजनीतिक पार्टियां असल में कैसे विलय करती हैं और ऐसे कदम के लिए कौन से कानूनी नियम लागू होते हैं? आइए जानते हैं इस बारे में पूरी जानकारी.

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दो तिहाई नियम का महत्व 

एक वैध राजनीतिक विलय के लिए सबसे जरूरी शर्त संसद या फिर राज्य विधानसभा में पार्टी के चुने हुए प्रतिनिधियों में से कम से कम दो तिहाई का समर्थन होना है. दसवीं अनुसूची के पैरा चार के मुताबिक अगर किसी पार्टी के दो तिहाई सांसद या फिर विधायक विलय के हिस्से के रूप में दूसरी पार्टी में शामिल होने पर सहमत होते हैं तो उन्हें दल बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित होने से सुरक्षा मिलती है. यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त विलय में भाग लेने पर कानून बनाने वालों की सीटें ना जाएं.

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कानून क्यों बदला गया?

2003 में 91वें संवैधानिक संशोधन से पहले, किसी पार्टी के विधायकों का एक तिहाई हिस्सा अपने कदम को विभाजन बता कर सुरक्षा का दावा कर सकता था. हालांकि संशोधन ने राजनीतिक दलबदल को हतोत्साहित करने के लिए विभाजन के प्रावधान को खत्म कर दिया.

विलय का विरोध करने वाले सदस्यों के अधिकार 

संविधान उन कानून बनाने वालों की भी रक्षा करता है जो विलय वाली पार्टी में शामिल नहीं होना चाहते. अगर कुछ सांसद या फिर विधायक मूल राजनीतिक समूह के साथ बने रहने का फैसला करते हैं तो वे अपनी सदस्यता खोए बिना एक अलग समूह के रूप में काम करना जारी रख सकते हैं. 

सुप्रीम कोर्ट का ट्विन टेस्ट 

कानूनी विशेषज्ञ अक्सर इस बात को तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के ट्विन टेस्ट का जिक्र करते हैं कि क्या विलय वैध है. पहली शर्त यह है कि विधायिका के बाहर मूल राजनीतिक पार्टी को औपचारिक रूप से किसी दूसरी पार्टी के साथ विलय करने का फैसला लेना होगा. दूसरी शर्त यह है कि उस पार्टी के कम से कम दो तिहाई विधायकों को विलय का समर्थन करना होगा. दोनों शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए. विधायक अकेले किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला नहीं कर सकते जब तक की मूल राजनीतिक संगठन ने आधिकारिक तौर पर इस कदम को मंजूरी न दी हो.

चुनाव आयोग की भूमिका 

एक बार संवैधानिक जरूरत पूरी हो जाने के बाद विलय की जानकारी औपचारिक रूप से भारत के चुनाव आयोग को देनी होती है. पार्टियों के दस्तावेजी सबूत जमा करने होते हैं. इनमें उनकी राष्ट्रीय कार्यकारी समिति या फिर अधिकृत गर्वनिंग बॉडीज द्वारा पारित प्रस्ताव शामिल होते हैं. इसके बाद चुनाव आयोग द्वारा रिकॉर्ड की जांच की जाती है और प्रशासनिक नजरिए से विलय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है.

चुनाव चिह्न का क्या होता है? 

चुनाव चिह्न का भविष्य विलय की प्रकृति पर निर्भर करता है. अगर कोई छोटी पार्टी किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी में विलय करती है तो आमतौर पर बड़ी पार्टी का चुनाव चिह्न ही बरकरार रहता है.  हालांकि अगर दो पार्टियां मिलकर पूरी तरह नया राजनीतिक संगठन बनाना चाहती हैं तो चुनाव आयोग अपने नियम और प्रक्रिया के मुताबिक नए चुनाव चिह्न आवंटित कर सकता है.

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