दुनिया के किन देशों में सबसे पहले खत्म होगा पेट्रोल-डीजल, किस पायदान पर हैं भारत-पाकिस्तान?
दुनिया के पास कुल मिलाकर अभी कई दशक का तेल है, लेकिन जिन देशों के पास खुद का भंडार कम है और खपत ज्यादा है, वे आयात पर टिके हैं. आइए जानें कि किन देशों के तेल के भंडार खत्म होने वाले हैं.

सोचिए, अगर एक दिन अचानक पेट्रोल पंप पर लिखा मिले ईंधन खत्म, तो क्या हो. दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तेल पर टिकी हैं, लेकिन कई देशों के अपने भंडार तेजी से घट रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि किन देशों में सबसे पहले पेट्रोल-डीजल खत्म हो सकता है? और भारत-पाकिस्तान इस सूची में कहां खड़े हैं? ताजा आंकड़े बताते हैं कि जिन देशों के पास कम भंडार और ज्यादा खपत है, उनके सामने असली खतरा मंडरा रहा है.
तेल भंडार क्यों बनते हैं ताकत?
आज की दुनिया में कच्चा तेल सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. जरा सी सप्लाई रुक जाए तो कीमतें उछल जाती हैं और असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ता है. इसी वजह से हर देश अपने तेल भंडार को सुरक्षा कवच की तरह देखता है.
ग्लोबल स्तर पर करीब 1.7 ट्रिलियन बैरल से ज्यादा प्रमाणित तेल भंडार मौजूद हैं. मौजूदा खपत के हिसाब से ये करीब 47 से 50 साल तक चल सकते हैं, लेकिन यह औसत तस्वीर है. असली कहानी हर देश के अलग-अलग हालात में छिपी है.
किन देशों में पहले खत्म हो सकता है तेल?
रिजर्व-टू-प्रोडक्शन रेशियो यानी भंडार और उत्पादन के अनुपात से अंदाजा लगाया जाता है कि किसी देश का तेल कितने साल चल सकता है. जिन देशों में उत्पादन ज्यादा और भंडार कम हैं, वहां तेल जल्दी खत्म हो सकता है.
अगर नए स्रोत नहीं मिले तो अर्जेंटीना, इंडोनेशिया और मेक्सिको जैसे देशों के बारे में पहले उद्योग जगत के आकलन बताते रहे हैं कि इनके पारंपरिक तेल भंडार लगभग 10 से 12 साल में खत्म हो सकते हैं. चीन और अंगोला जैसे बड़े उत्पादक देशों के भी पुराने भंडार सीमित माने जाते हैं. मलेशिया और अल्जीरिया जैसे देशों पर भी दबाव बढ़ रहा है.
यूरोप में यूनाइटेड किंगडम और इटली के पारंपरिक तेल भंडार को लेकर भी अनुमान है कि आने वाले 10 से 15 साल में ये काफी घट सकते हैं. ऑस्ट्रेलिया के पास घरेलू भंडार बहुत कम हैं और वहां ईंधन स्टोरेज कुछ हफ्तों की जरूरत भर का ही माना जाता है, इसलिए उसे आयात पर निर्भर रहना पड़ता है.
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि तेल के भंडार खत्म का मतलब पूरी तरह शून्य होना नहीं है, बल्कि आर्थिक रूप से सस्ता और आसानी से निकाला जा सकने वाला तेल कम पड़ना है.
भारत किस पायदान पर
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, लेकिन अपने भंडार के मामले में भारत शीर्ष देशों में नहीं आता है. भारत के पास जितना प्रमाणित तेल भंडार है, वह उसकी सालाना खपत के मुकाबले लगभग 2 से 3 साल के बराबर ही है.
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 से 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. यही वजह है कि वैश्विक बाजार में हलचल का असर भारत पर जल्दी पड़ता है.
हाल ही में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में बताया कि भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और अन्य स्टॉक मिलाकर देश लगभग 74 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है, अगर सप्लाई में बड़ी रुकावट आ जाए. इसका मतलब है कि भारत पूरी तरह खाली नहीं है, लेकिन आयात के बिना लंबा समय निकालना मुश्किल होगा.
पाकिस्तान की स्थिति
पाकिस्तान के पास करीब 0.5 अरब बैरल के आसपास प्रमाणित तेल भंडार बताए जाते हैं और वह भंडार की वैश्विक सूची में काफी नीचे आता है. उसकी सालाना खपत के मुकाबले उसके घरेलू भंडार लगभग एक से डेढ़ साल के बराबर ही हैं.
पाकिस्तान भी कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों के लिए आयात पर निर्भर है. इसके अलावा वहां प्राकृतिक गैस के घरेलू भंडार भी धीरे-धीरे घट रहे हैं, जिनके अगले दो दशक में कम होने का अनुमान जताया गया है, ऐसे में पाकिस्तान के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
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Source: IOCL

























